कल्पना से परे मगर हकीकत – शिमला के मास्टर मदन ने 3 साल की उम्र में शुरू कर दिया था गाना, साढ़े चौदह साल में अनूठा मुकाम हासिल कर लोप हो गया यह सितारा

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कल्पना से परे मगर हकीकत – शिमला के मास्टर मदन ने 3 साल की उम्र में शुरू कर दिया था गाना, साढ़े चौदह साल में अनूठा मुकाम हासिल कर लोप हो गया यह सितारा
फोकस हिमाचल फीचर डेस्क
तीन साल की जिस उम्र में जब बच्चे अभी ठीक से शब्दों का सही उच्चारण नहीं कर पाते वह गायन की कला में माहिर हो चुका था. साढ़े तीन साल की उम्र में जब ध्रुपद शैली का गायन किया तो श्रोता उसकी लय, तान और सुरों को सुनकर हैरान रह गए. आठ साल की उम्र तक पहुँचते पहुँचते उस बालक की गायन प्रतिभा का डंका बज चुका था. 13 साल की उम्र तक वह शास्त्रीय संगीत का बड़ा सितारा बन कर छा चुका था. गीत संगीत के इतिहास में ऐसी कोई मिसाल नहीं मिलती कि महज साढ़े चौदह साल जीने वाला एक बालक संगीत की दुनिया में एक ऐसा मुकाम स्थापित कर गया, जिसके बारे में सोचना तक असम्भव दिखता है. संगीत की दुनिया छोटी सी उम्र में चमत्कार कर लोप हो जाने वाले सितारे मास्टर मदन का शिमला से गहरा नाता रहा है.
शिमला में पहले शो से ही सुपर हिट
मास्टर मदन का जन्म 26 दिसंबर 1927 को जालंधर के एक सिख परिवार में हुआ. शिमला में उनकी गायकी का पहला प्रदर्शन होने के बाद वे वहीं रहने लगे थे.उसके बड़े भाई मास्टर मोहन महान कुंदन लाल सहगल के साथ गाते थे, मास्टर मदन का पहला प्रदर्शन मीडिया जगत की सुर्खी बन गया और रातों-रात मास्टर मदन गायकी की दुनिया के बड़े सितारे बन घर घर में इस छोटी उम्र के बड़े गायक के चर्चे होने लगे.
गाँधी के भाषण पर भारी मास्टर मदन के गीत
मास्टर मदन के गीतों का जादू किस तरह लोगों के सिर चढ़ बोलता था, इसका अंदाजा इसी प्रसंग से लगाया जा सकता है कि1940 में महात्मा गांधी एक अहम बैठक के सिलसिले में शिमला आये, लेकिन ऐसा पहली बार हुआ कि उनकी बैठक में बहुत कम लोग आए.इसके कारण तलाशे गए तो पता चला कि अधिकतर लोग गांधी का भाषण सुनने के बजाये मास्टर मदन का गायन सुनने सोलन चले गए थे.
मैथिलीशरण गुप्त की ‘भारत भारती में प्रतिभा का जिक्र
मास्टर मदन की असमय मौत को लेकर ऐसा भी कहा जाता है कि कोलकत्ता में एक मंत्रमुग्ध कर देने वाली ठुमरी, बिनती सुनो मेरी, सुनाने के बाद उऩ्हें किसी ने धीमा जहर दे दिया. ऐसी भी खुसर फुसर होती रही है कि एक दूसरे गायक ने उन्हें दूध में मर्करी मिलाकर दे दिया.इस प्रदर्शन के बाद मास्टर मदन फिर कभी गा नहीं सके. मैथिलीशरण गुप्त की ‘भारत भारती’ किताब में मास्टर मदन की प्रतिभा का विशेष जिक्र है कि मदन बचपन में ही अविश्वसनीय गायकी की वजह से ‘मास्टर’ कहलाने लगा था.

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