कमाक्षा मंदिर, काओ : शैया पर सोती है, पानी भी पीती है, अतुलनीय है माता मंदिर की वास्तुकला और काष्ठकला, भगवान परशुराम व अज्ञातवास में पांडवों की स्थापना माना जाता है यह मंदिर

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करसोग से मित्रदेव ‘मित्रा’ की रिपोर्ट

करसोग के काओ गांव में मां कमाक्षा का ऐतिहसिक मंदिर है। कामाक्षा मंदिर की परिक्रमा में अनेक देवी- देवताओं मातृगणों की 102 काष्ठ प्रतिमाएं विद्यमान हैं। इनका निर्माण हेतराम और दौलतराम थाच भनेरा के कारीगरों या शिल्पियों द्वारा किया गया है। देवी के गर्भगृह के साथ एक कमरे में देवी का शयन कक्ष है, इसमें देवी की शैया लगी है। आज भी हर सुबह इस शैया की चादर पर सिलवटें देखी जा सकती हैं। शैया के पास रात्री को रखे पानी के लोटे में से हर सुबह पानी का स्तर भी कम हो जाता है। ये सब घटनाचक्र देवी की प्रत्यक्ष विद्यमानता का साक्ष्य है।शिकारी माता मंदिर : बिना छत का मंदिर, बर्फ नहीं टिकती अंदर, मार्कण्डेय ऋषि की तपस्या से खुश होकर मां दुर्गा शक्ति रूप में यहां हुई स्थापित, पांडवों ने अज्ञातवास में किया था मंदिर का निर्माण, लेकिन नहीं हुआ था पूरा

शरद नवरात्रों की अष्टमी को होता है माता का ‘फेर’
करसोग मुख्यालय से मात्र 6 किलोमीटर की दूरी पर स्थित मां कामाक्षा नगर में देवशक्ति के साक्षात दर्शन करने का शोभाग्य शरद नवरात्रों में अष्टमी को प्राप्त होता है। दुर्गाष्टमी का मेला देखने के लिए क्षेत्र के दूर- दराज के लोग रात को जगराण में शामिल होते हैं। अर्धरात्री को मां कामाक्षा को जागृत करने के लिए मंदिर में आए श्रद्धालु सामूहिक रूप से मां कामक्षा का उदघोष करते हैं। इसके साथ आसमान की ओर बंदूकें दागी जाती हैं। वाद्ययंत्रों की थाप पर यह दृश्य काफी डरावना हो जाता है। माता की छाया से कई लोग झूमने लगते हैं, लेकिन जिस व्यक्ति पर देवी की कृपा हो जाए, उस व्यक्ति के शरीर में देवशक्ति का प्रवेश हो जाता है और वह व्यक्ति देवशक्ति से अवचेतन हो जाता है। कामाक्षा मंदिर में पुजारी हाथ में इस व्यक्ति के खडग़ देते हैं। आधी रात के बाद आयोजित किए जाने वाले इस कार्यक्रम को ‘फेर’ कहते है। नवमी के दिन कामाक्षा देवी की पूजा अर्चना के बाद माता के रथ के साथ हजारों लोग मंदिर के चारों ओर की परिक्रमा करते हैं। दोपहर के समय सब लोग माता के प्रांगण में फिर जुटते हैं। देवी के सम्मान में यह प्रथा सदियों से चली आ रही है।नगरोटा बगवां में बाबा बड़ोह :  श्री कृष्ण और उनकी प्रेमिका राधा को समर्पित संगमरमर का यह इकलौता मंदिर  

मंदिर के निर्माण को लेकर  जनश्रुतियां
कहते हैं कि इस मंदिर की स्थापना अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने की थी, मगर कुछ लोगों का मत है, कि इसकी स्थापना परशुराम जी ने की थी। मंदिर के निर्माण को लेकर कई जनश्रुतियां हैं, लेकिन लिखित कोई तथ्य नहीं है। मंदिर की वास्तुकला और काष्ठकला अतुलनीय है, जो बेहतरीन निर्माणकला का अनूठा उदाहरण है। इस ऐतिहासिक मंदिर के बाहर लगे बोर्ड पर साफ लिखा है कि कोई भी चमड़े की वस्तु मंदिर में  नहीं जाएगी।

 माता के सम्मान में कभी जमीन पर सोने का था गांव में प्रचलन
कुछ साल पहले तक काओ निवासी कमाक्षा देवी के सम्मान में अपने घरों में चारपाई पर नहीं सोते थे। यदि कोई व्यक्ति चारपाई पर सोने की चेष्ठा भी करता तो निद्रावस्था में देवी के दृष्टांत के साथ उक्त व्यक्ति के साथ कोई न कोई अनहोनी घटना घट जाती थी। देवी के कोप से मुक्ति के लिए वह व्यक्ति देवी मंदिर में जाकर देवी से क्षमा याचना करता था। उक्त व्यक्ति को देवी को दंड प्रदान करना पड़ता था, तब जाकर देवी का प्रकोप दूर होता था। कलांतर में गांव में देवी के नाम पर कुछ पैसे दंड रखकर महमानों को चारपाई पर सुलाने का सिलसिला शुरू कर दिया। धीरे-धीरे देवी की आज्ञा से काओ गांव के हर घर में चारपाई व खाट पर सोने की प्रथा चल पड़ी और एक पुरातन परम्परा खत्म हो गई। लेकिन आज भी यहां के बुजुर्ग बताते हैं कि काओ गांव में जमीन पर सोने की प्रथा रही है, जो देवी के सम्मान के तौर पर मानी जाती थी।  शिव मंदिर बैजनाथ : यहां रावण ने किए थे अपने शीश समर्पित, अज्ञातवास में पांडवों ने शुरू किया था मंदिर का निर्माण, शेष निर्माण कार्य आहूक एवं मनूक नाम के दो व्यापारियों ने किया था पूर्ण, जानिये कैसे कीरग्राम बैजनाथ के नाम से हुआ प्रसिद्ध

दर्शन के लिए पहनो धोती
कमाक्षा मंदिर में स्थित एक अन्य कमरे में भगवान विष्णु, भगवान यज्ञपति पुंडरीक, वटुक भैरव तथा एक गुफानुमा अंधेरे कमरे में भगवान परशुराम चिरंजीवी व सूर्य देवता की प्राचीन कलात्मक प्रतिमाएं रखीं हैं। परशुराम की प्रतिमा आदमकद हैं। मंदिर में दर्शन करने के लिए धोती पहनकर अंदर जाना पड़ता हैं। प्रात: चार बजे मां कामाक्षा व अन्य मूर्तियों के स्नान के लिए हाजड़ा बाबडी से हर रोज पानी लाया जाता है। पंडित बंसी लाल के अनुसार मां कामाक्षा सिद्धपीठ है। प्रदेश सरकार को पर्यटन विभाग के माध्यम से करसोग के शक्तिपीठों की जानकारी विश्व पर्यटन मानचित्र पर लानी चाहिए। कभी हर साल खास उत्सव के दौरान मंदिर में भैंसे की बलि देने की प्रथा थी, लेकिन 2014 में उच्च न्यायालय के एक ऐतिहासिक फैसले के बाद यहां बलि प्रथा पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया है। समय- समय पर मंदिर में विभिन्न धार्मिक आयोजन होते हैं, लेकिन नवरात्रों में मंदिर में खास आकर्षण होता है। नवरात्रों में दूर दूर से लोग मंदिर में पहुंचते हैं। काओ गांव का सौंदर्य अनछुआ है, लेकिन इस शक्तिपीठ को पर्यटन के दृष्टिगत अभी तक विकसित करने के प्रयास धीमे रहे हैं। प्रदेश सरकार के पर्यटन विभाग की यह जिम्मेवारी बनती है कि इस मंदिर के निर्माण और इतिहास से जुड़े पहलुओं से देश- दुनिया को परिचित करवाए। ताकि देश- दुनिया के पर्यटक इस ऐतिहासिक मंदिर के दर्शन के लिए यहां पहुंच सके। क्षेत्र में धार्मिक पर्यटन की असीम संभावनाओं का दोहन यहां की आर्थिकी को भी मजबूत करेगा।हाटकोटी में शैव- शक्ति के एकसाथ दर्शन, आठवीं शताब्दी में बना यह मंदिर स्थापत्य कला की दृष्टि से शिखर और पैगोड़ानुमा शिल्प की अमूल्य कृति, राजा विराट ने किया था मंदिर का निर्माण

ऐसे पहुंचे मंदिर
यहां पहुंचने के कई रास्ते हैं। शिमला से 110 किलोमीटर, सुंदरनगर से 100 किलोमीटर और रामपुर बुशहर से 85 कलोमीटर की दूरी पर स्थित इस मंदिर के लिए बस करसोग बस अड्डे पर आपको छोड़ देगी। यहांं से लोकल रूट की बस काओ गांव तक पहुंचा देगी।  यहां से काओ गांव की दूरी 6 किलोमीटर है। भलेई माता की प्रतिमा को आए पसीना तो समझो कि मन्नत जरूर होगी पूरी, चंबा जिले के चोहड़ा डैम के नजदीक राजा प्रताप सिंह ने स्थापित करवाया था मंदिर, 45 साल पहले चोरों ने मूर्ति चोरने का किया था प्रयास हो गये थे अंधे


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