कभी शिमला में म्युनिसिपल कार्पोरेशन में क्लर्क की नौकरी करते थे फिल्म गीतकार राजेंद्र कृष्ण, शिमला में ही 1945 में हुए अज़ीमुश्शान ऑल इंडिया मुशायरा में पहली बार पढ़ी थी शायरी, शायर-ए-आजम जिगर मुरादाबादी की दाद से बढ़ा हौसला, शिमला से मुंबई पहुंच गये गीत लिखने

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कभी शिमला में म्युनिसिपल कार्पोरेशन में क्लर्क की नौकरी करते थे फिल्म गीतकार राजेंद्र कृष्ण, शिमला में ही 1945 में हुए अज़ीमुश्शान ऑल इंडिया मुशायरा में पहली बार पढ़ी थी शायरी, शायर-ए-आजम जिगर मुरादाबादी की दाद से बढ़ा हौसला, शिमला से मुंबई पहुंच गये गीत लिखने

 

फोकस हिमाचल की शिमला से रिपोर्ट

साठ के दशक के फिल्म नगरी के मशहूर गीतकार राजेंद्र कृष्ण 1942 में शिमला की म्युनिसिपल कार्पोरेशन में क्लर्क की नौकरी करते थे। राजेन्द्र कृष्ण ऐसे गीतकार हैं, जिन्होंने जिन्होंने गीत लिखने के साथ हिंदी फ़िल्मों की कहानी, स्क्रिप्ट और संवाद भी लिखे। चार दशक तक उनका फ़िल्मों में सिक्का चला। इस दौरान उन्होंने कई नायाब गीत लिखे, जो लोगों ने बहुत पसंद किए। कुछ गीत तो सदाबहार हैं, जिन्हें आज भी लोग सुनते हैं और गुनगुनाते हैं। उनके लिखे गीतों का कोई जवाब नहीं। वे सचमुच लाजवाब हैं। राजेंद्र कृष्ण का पूरा नाम राजेंद्र कृष्ण दुग्गल था। उन्हें बचपन से ही शेर-ओ-शायरी का शौक था। अपना शौक पूरा करने के लिए वे स्कूल की किताबों में अदबी रिसालों को छिपाकर पढ़ते। यह शौक कुछ यूं परवान चढ़ा कि आगे चलकर ख़ुद लिखने भी लगे। पन्द्रह साल की उम्र तक आते-आते उन्होंने मुशायरों में शिरकत करना शुरू कर दिया। जहां उनकी शायरी ख़ूब पसंद भी की गई। इस गीतकार का जन्म जलालपुर जटन (जटाँ) (पँजाब – आज का पाकिस्तान) में 6 जून 1919 को हुआ था। दुग्गल ख़ानदान में जन्म होने से इनका नाम था राजेन्द्र कृष्ण दुग्गल। फ़िल्मों में इन्हें केवल राजेन्द्र कृष्ण के नाम से जाना जाता था।  राजेन्द्र कृष्ण को बचपन से ही शायरी का शौक़ था उस समय वे शायद आठवीं कक्षा के छात्र रहे होंगे। वे अपना लेखन उर्दू लिपि में किया करते थे। पंजाबी औऱ हिन्दी भी उर्दू ही लिपि में लिखी जाती।हिंदी सिनेमा में बोल्ड फिल्मों की ओर ‘इशारा’ ,  चिंतपूर्णी में जन्मे बीआर इशारा ने बर्निंग इशूज पर आधारित फिल्में बनाकर कमाया नाम

 

शिमला में हुए मुशायरे में शायर-ए-आजम जिगर के दाद से बढ़ा हौसला

राजेंद्र को शायरी का शौक था, लेकिन जैसे जैसे वे युवावस्था में आते गए रोजगारी भी जिंदगी का अहम मसला बन गई। लिहाज़ा साल 1942 में शिमला की म्युनिसिपल कार्पोरेशन में क्लर्क की छोटी सी नौकरी कर ली, लेकिन उनका दिल इस नौकरी में बिल्कुल भी नहीं लगता था। नौकरी के साथ-साथ उनका लिखना-पढ़ना और मुशायरों में शिरकत करना जारी रहा। उस समय में शिमला में  हर साल एक अज़ीमुश्शान ऑल इंडिया मुशायरा होता था, जिसमें मुल्क भर के नामचीन शायर अपना कलाम पढ़ने आया करते थे। 1945 के मुशायरे में कई बड़े शायरों के साथ नौजवान राजेंद्र कृष्ण भी शामिल थे। जब उनके पढ़ने की बारी आई, तो उन्होंने अपनी ग़ज़ल का मतला पढ़ा, ‘‘कुछ इस तरह वो मेरे पास आए बैठे हैं/जैसे आग से दामन बचाए बैठे हैं। ग़ज़ल के इस शेर को ख़ूब दाद मिली। दाद देने वालों में जनता के साथ-साथ जिगर मुरादाबादी की भी आवाज़ मिली। शायर-ए-आज़म जिगर मुरादाबादी की तारीफ़ से राजेन्द्र कृष्ण को अपनी शायरी पर विश्वास पैदा हुआ और उन्होंने शायरी और लेखन को ही अपना पेशा बनाने का फ़ैसला कर लिया। वे शिमला छोड़ मुंबई में अपनी किस्मत आज़माने जा पहुंचे।

बापू पर लिखा यादगार गीत

मायानगरी में राजेन्द्र कृष्ण को ज्यदा मुश्किलों का सामना नहीं करना पड़ा। 1947 में आई फ़िल्म ‘जनता’ में उन्होंने पहली बार पटकथा लिखी। उसके बाद फिल्म ‘जंज़ीर’में दो गीत लिखे। 1948 में आई  फ़िल्म ‘प्यार की जीत’ संगीतकार हुस्नलाल भगतराम के संगीत निर्देशन में चार गीत लिखे जो सुपर हिट हुए। 30 जनवरी, 1948 को महात्मा गांधी की हत्या हो गई। उस समय में राजेंद्र का लिखा उनपर गीत ‘सुनो सुनो ऐ दुनियावालों बापू की ये अमर कहानी’ काफी मशहूर हुआ। इस गीत को मोहम्मद रफी ने गाया था।बॉलीवुड में शिमला के पहले एक्टर विजय कुमार,  लाहौर में पढ़े, मुंबई और कोलकाता के सिनेमा में मचाई धूम, अभिनय क्षमता के साथ लेखन में भी चलता था उनका सिक्का

50 से 70 दशक के बीच कई यादगार गीत लिखे

50 से 70 दशक तक राजेंद्र  कृष्ण ने कई यादगार गीत लिखे, जिन्हें आज भी लोग बड़े चाव से सुनते हैं। उनके लिखे गीतों में गीत ‘मन डोले, तन डोले, मेरे दिल का गया क़रार रे’, ‘मेरा दिल ये पुकारे आजा’, ‘जादूगर सैयां छोड़ मोरी बैयां’। साल 1949 में फिल्म ‘बड़ी बहन’ में उन्हें एक बार फिर संगीतकार हुस्नलाल भगतराम के संगीत निर्देशन में गीत लिखने का मौक़ा मिला। इस फ़िल्म के भी सभी गाने हिट हुए। ख़ास तौर पर ‘चुप-चुप खड़े हो ज़रूर कोई बात है, पहली मुलाक़ात है ये पहली मुलाक़ात है’ और ‘चले जाना नहीं..’ इन गानों ने नौजवानों को अपना दीवाना बना लिया। सुर साम्राज्ञी लता मंगेशकर की आवाज़ ने इन गीतों में वह कशिश पैदा कर दी, जो आज भी दिल पर असर करती है। फ़िल्म ‘बहार’ (साल-1951) में शमशाद बेगम का गाया गीत ‘सैंया दिल में आना रे, ओ आके फिर न जाना रे’ भी ख़ूब मक़बूल हुआ। इन गानों ने राजेन्द्र कृष्ण को फ़िल्मों में गीतकार के तौर पर स्थापित कर दिया। साल 1953 में फ़िल्म ‘अनारकली’ और साल 1954 में आई ‘नागिन’ में उनके लिखे सभी गाने सुपर हिट साबित हुए। इन गानों की कामयाबी ने राजेन्द्र कृष्ण के नाम को देश के घर-घर तक पहुंचा दिया। फ़िल्म ‘अनारकली’ में यूं तो उनके अलावा तीन और गीतकारों जांनिसार अख़्तर, हसरत जयपुरी, शैलेन्द्र ने गीत लिखे थे, लेकिन राजेन्द्र कृष्ण के लिखे सभी गीत बेहद पसंद किए गए। ‘ज़िंदगी प्यार की दो-चार घड़ी होती है..’, ‘जाग दर्दे-ए इश्क जाग’, ‘ये ज़िंदगी उसी की है’ और ‘मोहब्बत में ऐसे क़दम डगमगाए’ उनके लिखे गीतों को हेमंत कुमार और लता मंगेशकर की जादुई आवाज़ ने नई बुलंदियों पर पहुंचा दिया। इसी फ़िल्म से उनकी जोड़ी संगीतकार सी. रामचंद्रा के साथ बनी। इस जोड़ी ने आगे चलकर कई सुपर हिट फ़िल्में ‘पतंगा’, ‘अलबेला’, ‘पहली झलक’, ‘आज़ाद’ आदि दीं। इन फ़िल्मों में लता मंगेशकर द्वारा गाये गए गीत खूब लोकप्रिय हुए।‘साधना कट’ की गवाह शिमला की वादियां : ‘लव इन शिमला’ की नायिका के हेयर स्टाइल को फॉलो करने लगी थीं देशभर की युवतियां

यादगार गीत जो भुलाये नहीं जा सकते

फ़िल्म ‘नागिन’ में उन्होंने एक से बढ़कर एक गीत ‘मन डोले, तन डोले, मेरे दिल का गया क़रार रे’, ‘मेरा दिल ये पुकारे आजा’, ‘जादूगर सैयां छोड़ मोरी बैयां’ लिखे। संगीतकार हेमंत कुमार ने इस फिल्म का संगीत दिया था। संगीतकार मदन मोहन के लिए उन्होंने जो गाने लिखे, उनमें उन्होंने लाजवाब शायरी है। ऐसी ही एक फिल्म ‘अदालत’ में राजेन्द्र कृष्ण ने एक से बढ़कर एक  ग़ज़लें  लिखीं, जिनमें ‘उनको ये शिकायत है कि हम कुछ नहीं कहते’, ‘जाना था हमसे दूर बहाने बना लिये’ और ‘यूं हसरतों के दाग़ मुहब्बत में धो लिये। फ़िल्म की हर सिचुएशन पर राजेन्द्र कृष्ण को गीत लिखने की महारत हासिल थी। उनके सुपर हिट गीतों की एक लंबी फ़ेहरिस्त है, जो कभी भुलाए नहीं जाएंगे। ‘चल उड़ जा रे पंछी कि अब ये देश हुआ बेगाना’ (फ़िल्म-भाभी), ‘जहां डाल डाल पर सोने की चिड़ियां करती हैं बसेरा’ (फ़िल्म- सिकन्दर-ए-आज़म)। राजेन्द्र कृष्ण ने फ़िल्मों में कई कॉमेडी और अनूठे गीत भी रचे। जो अपनी ज़बान और अलबेले अंदाज की वजह से अलग ही पहचाने जाते हैं। मिसाल के तौर पर उनके लिखे गए इन गीतों पर एक नज़र डालिए ‘शाम ढले खिड़की तले तुम सीटी बजाना छोड़ दो’ (फ़िल्म-अलबेला), ‘मेरे पिया गये रंगून, वहां से किया है टेलिफ़ून’ (फ़िल्म-पतंगा),‘इक चतुर नार करके सिंगार’ (फ़िल्म-पड़ोसन), ‘ईना मीना डीका’ (फ़िल्म-आशा)।

300 के करीब फिलमों में गीत लिखे
गीतकार राजेंद्र कृष्ण ने तक़रीबन 300 फ़िल्मों के लिए एक हज़ार से ज़्यादा गीत लिखे। सौ से ज़्यादा फ़िल्मों की कहानी, संवाद और पटकथा लिखीं, जिसमें उनके द्वारा लिखी कुछ प्रमुख फ़िल्में ‘पड़ोसन’, ‘छाया’, ‘प्यार का सपना’, ‘मनमौजी’, ‘धर्माधिकारी’, ‘मां-बाप’, ‘साधु और शैतान’ हैं। एक वक़्त ऐसा भी था, जब राजेन्द्र कृष्ण उन्हीं फ़िल्मों में गीत लिखते थे, जिसमें उनके संवाद और पटकथा होती थी। राजेंद्र ने कई भजन भी लिखे। अपने शानदार गीतों के लिए राजेन्द्र कृष्ण कई पुरस्कारों और सम्मान से भी नवाज़े गए। साल 1965 में उन्हें ‘तुम्ही मेरे मंदिर, तुम्ही मेरी पूजा’ (फ़िल्म-ख़ानदान) गीत के लिए सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला। 23 सितम्बर 1987 को राजेन्द्र कृष्ण की मृत्यु हो गयी। मृत्यु के समय वे 68 वर्ष के थे। उनके जीवन में उनकी अंतिम फ़िल्म थी अल्लारक्खा जो कि 1986 में रिलीज़ हुई थी। मगर उनके निधन के बाद उनकी फ़िल्म आग का दरिया 1990 में रिलीज़ हुई। सिनेमा में शिमला – दो ‘मिस शिमला’ के अभिनय से सजी हिंदी सिनेमा की इकलौती सुपर डुपर हिट फिल्म ‘टैक्सी ड्राइवर’

 


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