कभी दिल्ली की सड़कों पर चलाया ऑटो, जुगाड़ से मशीन बना बदला प्रोसेसिंग उद्योग का चेहरा, अब हिमाचल को कमाई के गुर सिखाएंगे यमुनानगर के धर्मवीर कंबोज

Spread the love

कभी दिल्ली की सड़कों पर चलाया ऑटो, जुगाड़ से मशीन बना बदला प्रोसेसिंग उद्योग का चेहरा, अब हिमाचल को कमाई के गुर सिखाएंगे यमुनानगर के धर्मवीर कंबोज
शिमला से विनोद भावुक की रिपोर्ट
हरियाणा के यमुनानगर के जिले के दंगला गांव के धर्मवीर कंबोज कभी दिल्ली की सड़कों पर रिक्शा चलाते थे, लेकिन आज भारत के फ़ूड प्रोसेसिंग उद्योग में उनकी जुगाड़ से बनाई मशीन की जबरदस्त धूम है। उनकी बने मशीनों ने जहां हजारों किसानों को रोजगार दिया है, वहीँ वे खुद आज सफल उद्यमी, किसान और ट्रेनर हैं।उनकी सलाना आय 80 लाख से एक करोड़ रूपए के बीच है। धर्मवीर कंबोज 22 मई से 26 तक हिमाचल प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में जा कर किसानों और महिला मंडलों को खुद के खेतों में उगाई जाने वाली जैविक सब्जियों और जड़ी बूटियों को प्रोसेसिंग से जरिये आर्थिकी बदलने के गुर सिखायेंगे। क्षेत्रीय एवं सुगमता केंद्र उत्तर भारत के क्षेत्रीय निदेशक डॉ अरुण चंदन ने बताया कि धर्मवीर कंबोज स्वयम सहायता समूहों के निशुल्क प्रशिक्षित करेंगे।किसानों के टूर में उन्हें अजमेर जाने का अवसर मिला। वहां मैनुअल प्रोसेसिंग देख कर उन्हें ऐसी मशीन बनाने का आईडिया आया जिससे प्रोसेसिंग का काम आसान हो जाए।
उन्होंने ऐसी मशीन की परिकल्पना को सच कर दिखाया जो जूस निकालने, छिलके जेल जैसे उत्पाद बनाते हैं,आंवला, अमरूद, स्ट्राबेरी और गाजर, अदरक, लहसुन की भी प्रोसेसिंग करती है। डेढ़ लाख रुपए की इस मशीन का बाद में पेटेंट भी गया। यह मशीन सब्जियों का छिल्का उतारने, कटाई करने, उबालने और जूस बनाने का काम किया जाता है।
धर्मवीर की बनाई मशीन सिंगल फेज बिजली से चलती है और इसमें मोटर की रफ्तार को नियंत्रित करने की भी व्यवस्था है ताकि जरूरत के अनुसार उसका उपयोग किया जा सके। वे अब तक 250 मशीनें बेच चुके हैं। इनमें से अफ्रीका को 20 और नेपाल को आठ मशीनें दी गई हैं। अधिकांश मशीनों को सेल्फ हेल्फ ग्रुप को बेचा गया है। उन्होंने एक वेजीटेबल कटर मशीन भी बनाई है, जो एक घंटे में 250 किलो सब्जियों को काट सकती है। बिजली से चलने वाली इस मशीन की कीमत 6,000 रुपए रखी गई है। उन्होंने फलों, सब्जियों, इलायची और जड़ी-बूटियों को सुखाने वाली कम कीमत की एक मशीन भी बनाई है।
आज धर्मवीर जैविक खेती करते हैं, लेकिन वो अपनी फसल को मंडी में नहीं बेचते हैं। जितनी भी फसल होती है, उसकी प्रोसेसिंग और अच्छी पैकिंग करके बाजार में बेचते हैं। वे तुलसी का तेल, सोयाबीन का दूध, हल्दी का अर्क तो तैयार करते ही हैं गुलाब जल, जीरे का तेल, पपीते और जामुन का जैम आदि भी तैयार करते हैं। वे अमरूद का जूस निकालने के अलावा इसकी आइसक्रीम और अमरूद की टॉफी भी बनाते हैं।
धर्मवीर को वर्ष 2010 में नेशनल फॉर्म साइंटिस्ट पुरस्कार राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया है जबकि वर्ष 2013 में खाद्य प्रसंस्करण के क्षेत्र में राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है।धर्मवीर सेल्फ हेल्प ग्रुप की महिलाओं को घरेलू स्तर पर खाद्य प्रसंस्करण के लिए मुफ्त में प्रशिक्षण देते हैं और देश में अब तक 4,000 महिलाओं को प्रशिक्षित किया गया है। उनके खुद के कारोबार से 35 महिलाएं भी जुड़ी हैं।
कभी दिल्ली की सड़कों पर चलाया ऑटो, जुगाड़ से मशीन बना बदला प्रोसेसिंग उद्योग का चेहरा, अब हिमाचल को कमाई के गुर सिखाएंगे यमुनानगर के धर्मवीर कंबोज
शिमला से विनोद भावुक की रिपोर्ट
हरियाणा के यमुनानगर के जिले के दंगला गांव के धर्मवीर कंबोज कभी दिल्ली की सड़कों पर रिक्शा चलाते थे, लेकिन आज भारत के फ़ूड प्रोसेसिंग उद्योग में उनकी जुगाड़ से बनाई मशीन की जबरदस्त धूम है। उनकी बने मशीनों ने जहां हजारों किसानों को रोजगार दिया है, वहीँ वे खुद आज सफल उद्यमी, किसान और ट्रेनर हैं।उनकी सलाना आय 80 लाख से एक करोड़ रूपए के बीच है। धर्मवीर कंबोज 22 मई से 26 तक हिमाचल प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में जा कर किसानों और महिला मंडलों को खुद के खेतों में उगाई जाने वाली जैविक सब्जियों और जड़ी बूटियों को प्रोसेसिंग से जरिये आर्थिकी बदलने के गुर सिखायेंगे। क्षेत्रीय एवं सुगमता केंद्र उत्तर भारत के क्षेत्रीय निदेशक डॉ अरुण चंदन ने बताया कि धर्मवीर कंबोज स्वयम सहायता समूहों के निशुल्क प्रशिक्षित करेंगे।
किसानों के टूर में उन्हें अजमेर जाने का अवसर मिला। वहां मैनुअल प्रोसेसिंग देख कर उन्हें ऐसी मशीन बनाने का आईडिया आया जिससे प्रोसेसिंग का काम आसान हो जाए।
उन्होंने ऐसी मशीन की परिकल्पना को सच कर दिखाया जो जूस निकालने, छिलके जेल जैसे उत्पाद बनाते हैं,आंवला, अमरूद, स्ट्राबेरी और गाजर, अदरक, लहसुन की भी प्रोसेसिंग करती है। डेढ़ लाख रुपए की इस मशीन का बाद में पेटेंट भी गया। यह मशीन सब्जियों का छिल्का उतारने, कटाई करने, उबालने और जूस बनाने का काम किया जाता है।
धर्मवीर की बनाई मशीन सिंगल फेज बिजली से चलती है और इसमें मोटर की रफ्तार को नियंत्रित करने की भी व्यवस्था है ताकि जरूरत के अनुसार उसका उपयोग किया जा सके। वे अब तक 250 मशीनें बेच चुके हैं। इनमें से अफ्रीका को 20 और नेपाल को आठ मशीनें दी गई हैं। अधिकांश मशीनों को सेल्फ हेल्फ ग्रुप को बेचा गया है। उन्होंने एक वेजीटेबल कटर मशीन भी बनाई है, जो एक घंटे में 250 किलो सब्जियों को काट सकती है। बिजली से चलने वाली इस मशीन की कीमत 6,000 रुपए रखी गई है। उन्होंने फलों, सब्जियों, इलायची और जड़ी-बूटियों को सुखाने वाली कम कीमत की एक मशीन भी बनाई है।
आज धर्मवीर जैविक खेती करते हैं, लेकिन वो अपनी फसल को मंडी में नहीं बेचते हैं। जितनी भी फसल होती है, उसकी प्रोसेसिंग और अच्छी पैकिंग करके बाजार में बेचते हैं। वे तुलसी का तेल, सोयाबीन का दूध, हल्दी का अर्क तो तैयार करते ही हैं गुलाब जल, जीरे का तेल, पपीते और जामुन का जैम आदि भी तैयार करते हैं। वे अमरूद का जूस निकालने के अलावा इसकी आइसक्रीम और अमरूद की टॉफी भी बनाते हैं।
धर्मवीर को वर्ष 2010 में नेशनल फॉर्म साइंटिस्ट पुरस्कार राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया है जबकि वर्ष 2013 में खाद्य प्रसंस्करण के क्षेत्र में राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है।धर्मवीर सेल्फ हेल्प ग्रुप की महिलाओं को घरेलू स्तर पर खाद्य प्रसंस्करण के लिए मुफ्त में प्रशिक्षण देते हैं और देश में अब तक 4,000 महिलाओं को प्रशिक्षित किया गया है। उनके खुद के कारोबार से 35 महिलाएं भी जुड़ी हैं।

Spread the love

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *