कभी दादा थे मंडी के मशहूर हलवाई, पोते ने ट्रांसपोर्ट बिजनस छोड़ ‘हिमाचली रसोई’ चलाई. पिपली में लीजिये शुद्ध शाकाहारी मंडयाली धाम का आनंद

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कभी दादा थे मंडी के मशहूर हलवाई, पोते ने ट्रांसपोर्ट बिजनस छोड़ ‘हिमाचली रसोई’ चलाई. पिपली में लीजिये शुद्ध शाकाहारी मंडयाली धाम का आनंद
मंडी से सत्य प्रकाश की रिपोर्ट
मूल रूप से मंडी शहर के भागवाहन मुहल्ला के निवासी राजेन्द्र बहल के दादा मंगत राम की किसी ज़माने में मंडी शहर में मिठाई की मशहूर दुकान हुआ करती थी. मंगत राम एक माने हुए हलवाई थे और उनकी बनाई मिठाई दूर- दूर तक मशहूर थी. कलांतर में मिठाई की यह दुकान बंद हो गई और प्रोपर्टी किसी को किराए पर दे दी गई.
राजेन्द्र बहल के दिल के किसी कोने में यह हसरत थी कि वह दादा की राह पर चलते हुए इसी तरह का स्टार्टअप शुरू करूँ, लेकिन ऐसा संभव नहीं हुआ और उन्होंने ट्रांसपोर्ट का कारोबार कर लिया. हालांकि एक दशक पहले उन्होंने एक बार फिर इस आइडिया के बारे में सोचा, लेकिन बात विचार से आगे नहीं बढ़ी. कोविड 19 के चलते जब पिछले साल देशव्यापी लॉकडाउन लगा तो राजेन्द्र बहल ने ट्रांसपोर्ट के कारोबार को समेत कर हिमाचली रसोई के नाम से स्थानीय व्यंजन परोसने के स्टार्टअप को शुरू करने की पहल की.
लोकल लुक वाला फ़ूड कॉर्नर
पठानकोट – मंडी नॅशनल हाईवे पर मंडी से द्रंग जाते वक्त कुन्नू से पहले पिपली नामक स्थान पर स्थित ‘हिमाचली रसोई’ में स्थानीय भोजन मंड्याली धाम का आनंद लिया जा सकता है. ‘हिमाचली रसोई’ को स्थानीय लुक दिया गया है और इसकी दीवारों को बैम्बू कार्विंग से सजाया गया है. इस फ़ूड कॉर्नर की शुरुआत 26 मार्च हो हुई, लेकिन हिमाचल बंद होने के कारण काम नियमित शुरू नहीं हो पाया. अब बंद की बंदिशें हटते ही ‘हिमाचली रसोई’ शुरू हो गई है. हिमाचली रसोई का जिम्मा खुद राजेन्द्र बहल और उनकी पत्नी सीमा बहल संभालते हैं. राजेन्द्र बहल ने फोकस हिमाचल को कि आने वाले समय में यहां स्थानीय स्तर पर पैदा होने वाले उत्पाद आचार- चट्ट्नी और मुरब्बा भी ग्राहकों के लिए उपलब्ध होंगे.

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