कभी डॉक्टरेट करने के लिए खटखटाना पड़ा था अदालत का दरवाजा, अब प्रदेश सरकार ने किया प्रतिभा का सम्मान

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कभी डॉक्टरेट करने के लिए खटखटाना पड़ा था अदालत का दरवाजा, अब प्रदेश सरकार ने किया प्रतिभा का सम्मान
धर्मशाला से विनोद भावुक की रिपोर्ट
स्टेट अवार्ड मिलने पर बेशक कांगड़ा जिला के प्राथमिक स्कूल खारटी के डॉ. विजय पुरी सुर्खिया बटोर रहे हैं और सोशल मीडिया पर उन्हें बधाईयां देने वालों का तांता लगा है, लेकिन कम ही लोग जानते हैं कि उन्हें अपनी डॉक्टरेट की पढ़ाई पूरी करने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा था। प्रदेश विश्वविद्यालय प्रशासन तीन साल उनकी मौखिक परीक्षा लेना ही भूल गया, जिसकी वजह के उनकी पढ़ाई में देरी हुई और शिक्षक जगत की कई अहम प्रतियोगी परीक्षाओं में भाग लेने से वंचित रह गए।
गाइड ने दो टूक मना कर दिया
‘फोकस हिमाचल’ के साथ संवाद में डॉ. विजय पुरी ने बताया कि सफलता के दौर में दुनिया साथ होती है, लेकिन संघर्ष नितांत अकेले ही करना पड़ता है। पीएचडी करते हुए एक दौर ऐसा भी आया जब लगा कि अब डॉक्टरेट मात्र स्वप्न ही रह जाएगा। कारण समझ नहीं पा रहा था, निर्देशक क्यों नाराज हो गए? पीएचडी करने के दौरान ही किडनी में पथरी होने की वजह से उठना बैठना मुश्किल हो गया था लेकिन इस दर्द को सहते हुए थीसिस पूरी की और फिर ऑपरेशन करवाया। इसी दौरान पिता जी भी बहुत बीमार रहे, उनकी तरफ भी चिंता लगी रहती, पर उनकी इच्छा यही थी कि बेटा अपना रिसर्च वर्क पूरा कर ले। पर मैं क्या करता? गाइड महोदय ने अंत में दो टूक शब्दों में मना कर दिया। मेरे साथ अन्य स्कॉलर भी निशाना बने।
कुलपति तक पहुंचा मामला
डॉ पुरी कहते हैं कि अन्य स्कॉलरों के निवेदन स्वीकार कर लिए गए और उन्हें मना कर दिया। इससे लगा कि यह सब नाटक उनके लिए ही है। मुद्दा कुलपति के पास पहुंचा और पुन: पीएचडी का काम चेक होने लगा, लेकिन हर बार त्रुटियां और हर बार तिरस्कार होता रहा। कई बार परेशान हो उठता, लेकिन फिर से काम में जुट जाता, पूरी पूरी रात उसे पुन: लिखता और अगली सुबह चेक करवाने पहुंच जाता। तमाम उलझनों के बावजूद अन्तत: थीसिस पूरी हुई और निर्धारित समय से पहले उसे विभाग में जमा करवा दिया।
मौखिक परीक्षा के लिए अदालत की शरण
डॉ पुरी कहते हैं कि थीसिस जमा होने के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन उनकी मौखिकी लेना ही भूल गया। तमाम कोशिशों के बावजूद कोई बात नहीं दिखी तो मजबूरन अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा। मामला कोर्ट में पहुंचा तो पौने तीन साल बाद डॉक्टरेट के लिए माखिक परीक्षा हुई। इस तरह डॉक्टरेट की डिग्री हासिल हुई। उन्हें मलाल का है कि इस देरी के चलते उनका करियर बुरी तरह से प्रभावित हुआ और शिक्षक के क्षेत्र की गई प्रतियोगी परीक्षाओं में भाग नहीं ले पाए।
हिम्मत नहीं खोई, हौंसला नहीं खोया
डॉ. विजय पुरी कहते हैं कि सबसे बड़ी बात यह है कि मैंने हिम्मत नहीं खोई, हौंसला नहीं खोया। जब सब तरफ से निराशाजनक स्थिति हावी हो रही थी तो आशा की किरण भी झलक दिखला जाती । टीस मन में थी जो राजकीय प्राथमिक विद्यालय खारटी के नन्हें नन्हें बच्चों की निश्छल मोहक मुस्कान ने खत्म कर दी, उन्हें देखकर लगा कि अगर इनके लिए कुछ भी कर सका तो मैं स्वयं ही सब कुछ प्राप्त कर लूंगा। यही बच्चे मेरे लिए पलपल के साथी बने। उनके संग में शिक्षा, संस्कृति और संस्कारों के प्रति जो लगन पैदा हुई वह मेरे लिए पुष्ट आधार बन गई। खारटी में रह कर मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला। अभिभावकों का अपनापन, बच्चों का प्यार, सहयोगियों का स्नेह और भी बहुत कुछ।

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