कंप्यूटर साइंस में एमटेक जिला ऊना के गांव सिंहाणा के मंजीत ने चार साल पहले शुरू की प्राकृतिक खेती, आज कई किसानों को दे रहे हैं प्रशिक्षण, युवाओं को स्वरोजगार के लिए कर रहे प्रेरित

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कंप्यूटर साइंस में एमटेक जिला ऊना के गांव सिंहाणा के मंजीत ने चार साल पहले शुरू की प्राकृतिक खेती, आज कई किसानों को दे रहे हैं प्रशिक्षण, युवाओं को स्वरोजगार के लिए कर रहे प्रेरित
फोकस हिमाचल ब्यूरो की ऊना से रिपोर्ट
खेती में अधिक उत्पादन के लिए किसान कुछ सालों से रासायनिक खेती कर रहे थे और महंगे खरपतवारों व कीटनाशकों का अंधाधुध प्रयोग कर रहे थे। इससे खेती की उर्वरता तो कम हो रही थी। साथ ही पर्यावरण और स्वास्थ्य पर भी भारी नुकसान पहुंच रहा था। यही कारण है कि प्रदेश के किसान प्राकृतिक खेती की ओर मुड़े और जैविक खाद का इस्तेमाल करना शुरू किया। ऐसे की एक युवा किसान हैं जिला ऊना के बंगाणा ब्लॉक के गांव सिंहाणा के रहने वाले मंजीत सिंह। मंजीत सिंह 2016 से पॉलीहाउस खेती कर रहे हैं। 2018 को उन्होंने प्राकृतिक खेती की शुरुआत की। किसान किसान प्रशिक्षण शिविरों में भाग लेकर प्राकृतिक खेती के बारे में जानकारी हासिल की। उन्होंने बारीकी से प्राकृतिक खेती की तकनीक सीखी। आज मंजीत कई किसानों को प्राकृतिक खेती की ट्रेनिंग दे रहे हैं और उन्हें प्राकृतिक खेती के लिए जागरूक कर रहे हैं। रासायनिक खेती के नुकसान का पता चला तो ऊना के किसान सुरेश ने एक साल पहले शुरू की जैविक खेती, उनकी उगाई सब्जियों की बढ़ी मांग, बेहतर आमदनी हो रही
मनजीत सिंह कंप्यूटर साइंस में है एमटेक
मंजीत ने कंप्यूटर साइंस में एमटेक करने के बाद वर्ष 2009 से 2016 तक हिमाचल यूनिवर्सिटी शिमला में सहायक प्रोफेसर पद पर अपनी सेवाएं भी दी हैं। युवाओं को स्वरोजगार के लिए प्रेरित कर रहे हैं मंजीत सिंहउपमंडल बंगाणा की सिहाणा पंचायत का मनजीत सिंह अब जीरो बजट जैविक खेती को लेकर कुटलैहड़ के युवाओं में प्रेरणा स्रोत बने हैं। कीवी का उत्पादन करने वाले प्रदेश के पहले किसान सिरमौर के गांव थलेडी के नरेंद्र पंवार, 29 साल पहले 1993 में की थी शुरुआत, आज प्रदेश के कई बागवानों के लिए बने मिसाल
डॉ. सुभाष पालेकर से प्राकृतिक खेती के बारे में जाना
मंजीत सिंह का कहना है कि सबसे पहले उन्होंने नौणी में दो दिन का प्रशिक्षण शिविर लगाया। उसके बाद पालमपुर कृषि विश्वविद्यालय में छह दिन तक डॉ. सुभाष पालेकर से प्राकृतिक खेती करने के गुर सीखे। आज उन्होंने अपने पॉलीहाउस में ब्रॉकली के 2,500 पौधे लगाए हैं । मंजीत का कहना है कि मेरा अनुभव है कि प्राकृतिक खेती से जहाँ कीट-पतंगों का प्रभाव कम होता है, वहीं खेतों में जंगली जानवर भी कम घुसते हैं।
लंबे समय तक रसायनिक खेती नहीं सही : मंजीत
मंजीत मानते हैं कि रसायनों के भरोसे लंबे समय तक खेती करना संभव नहीं। इससे मिट्टी तो खराब होती ही है, साथ ही इंसानी सेहत से भी खिलवाड़ होता है। खेती लागत को कम करने के लिए वह वर्षा जल संग्रहण के माध्यम से सिंचाई करते हैं। वह अपने घर की छत से बरसाती पानी को एकत्रित कर, उसे एक टैंक तक पहुंचाते हैं। यह टैंक कुछ ऊंचाई पर बनाया गया है, ताकि गुरुत्वाकर्षण की मदद से पानी पॉलीहाउस तक बिना किसी खर्च के आसानी से पहुंच जाए।
एक हजार वर्ग मीटर में लगाया है पॉलीहाउस
मंजीत ने एक हजार वर्ग मीटर में एक पॉलीहाउस लगाया था। आम लोग पढ़ाई करने के बाद सरकारी नौकरी अथवा अच्छी नौकरी के पीछे भागते हैं, लेकिन उन्होंने उनसे कुछ अलग करने के लिए कृषि को विकल्प चुना।
पॉलीहाउस के बनते ही सब्जियां लगानी शुरु कर दीं, और तीन वर्षों तक खूब सब्जियां भी उगाई। परिणाम उम्मीद के मुताबिक नहीं लगा तो तकनीक को बदलने की सोची। करीब तीन साल पहले उन्होंने अपने पॉलीहाउस में जीरो बजट जैविक खेती यानी प्राकृतिक सब्जियों को उगाने के फैसला किया। वहीं प्राकृतिक खेती के लिए उन्होंने सरकार की योजना का भी लाभ लिया। आज उनके ग्रीन हाउस के आस पास जितनी भी उपजाऊ भूमि है, वहां भी प्राकृतिक खेती की जा रही है।मंजीत सिंह का कहना है कि उन्हें सालाना 4 लाख के करीब सब्जियों में मुनाफा होता है और घर की फसल भी जीरो बजट जैविक खेती के माध्यम से उगाई जाती हैं।बंदरों की बर्बादी से तंग आकर मंडी के बिंगा गांव के किसानों ने शुरू जैविक खेती, अरबी, हल्दी की उपज से कर रहे बेहतर कमाई, प्रदेश भर में यहां की अरबी की मांग

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