औरत के बलिदान का प्रतीक रुकमणि कुंड, जल संकट पड़ने पर जमींदार ने पुत्रवधू को चिनवाया था तब फुटी थी जल धारा

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रुकमणि कुंड जाने के लिए भगेड़ से गेहड़वीं या फिर झील के उस पार बेस गांव कल्लर या बहना जात्ता से तीन चार किमी चढ़ाई चढ़ कर इस धार्मिक सथल पार पहुंचा जा सकता है। रोचक यह है कि रुकमणि के मायके  तरेड़ गांव के निवासी न तो कुंड में स्नान  करते हैं और न ही वे इस कुंड का पानी पीते हैं।

हिमाचल प्रदेश देव भूमि है और यहां वर्ष भर तीज- त्योहारों व मेलों की भरमार रहती है, जिसके कारण यहां की लोक संस्कृति व आपसी भाईचारे की अनूठी मिसाल देखने को मिलती है। इसी तरह जिला बिलासपुर की गोबिंद सागर झील के उस पार ऊंची पहाडिय़ों के बीच एक तालाब है, जो रुकमणि कुंड के नाम से प्रसिद्ध है। इस कुंड के साथ ऐसी बहादुर युवती के बलिदान  की कहानी है जो किसी की  सिर्फ मां या पत्नी ही नहीं थी, बल्कि अपने मां-बाप की दुलारी बेटी भी  थी, जिसका नाम रुकमणि था। एक किवदंती के अनुसार गर्मी का जून महीना था और भीषण गर्मी के कारण सभी पेयजल स्त्रोत सूख गए थे। गांव वाले पानी की एक- एक बूंद को तरस गए थे। चारों ओर पानी के लिए हाहाकार मची हुई थी। गांव के लोग ऐसी स्थिति में गांव छोड़ कर कहीं दूर चले जाने के बारे मे सोचने लगे थे। जब उनसे नहीं सहा गया तो वे गांव के जमींदार के घर एकत्रित हुए और उनसे आग्रह किया कि वे इस गांव को छोड़कर कहीं दूसरे स्थान पर उनके साथ चलें।मंडी के प्राचीन इतिहास की गहन गुफाओं में अंधेरा,  मंडी के प्राचीन इतिहास में बौद्ध संदर्भों की तलाश की कोशिश, कभी प्रसिद्ध यायावर राहुल सांस्कृत्यायन ने भी मंडी के इतिहास को खंगालने के किए थे प्रयास

गांववासियों की बात सुनकर जमींदार असमंजस में पड़ गया। उसे अपने पुरखों का गांव छोडऩे में संकोच हो रहा था, परन्तु इसके अतिरिक्त  अन्य कोई उपाय भी नहीं था। भारी मन से उसने एलान कर दिया कि अगले कल सभी गांववासी उसके घर एकत्रित होंगे और वहां से ऐसी जगह के लिए चल पड़ेंगे जहां पर पेयजल और पशुओं के लिए चारागाह भी हो। उस दिन जमींदार बहुत उदास और परेशान रहा। पूरी रात वह सो न सका। दु:ख व बेचैनी के बादल उसकी आंखों में मंडराते रहे। रात के अंतिम पहर में जमींदार कि आंख लग गई और वह सो गया। जमींदार को एक सपना आया, जिसमें ग्राम देवता ने उससे कहा कि अगर तुम पानी चाहते हो तो बलिदान करना होगा। ग्राम देवता ने कहा कि अपने पुत्र या पुत्रवधु का बलिदान दोगे तो गांव मे पानी कि धारा बहने लगेगी।  जमींदार का सपना टूट गया।इतिहास का ‘नगीना’, पठियार का ‘लखीना’ : मौर्यकालीन ब्रह्मी एवं खरोष्ठी लिपि में लिखित 2200 वर्ष पुराने ऐतिहासिक शिलालेख को समझने की कोशिश

वह उठ कर बिस्तर पर बैठा। उसे बाहर आंगन मे शोर गुल सुनाई दिया। सुबह  हो गई थी   और गांववासी जमींदार के घर पर एकत्रित हो गए थे। लोग उसके बेटे और  पुत्रवधु को नजदीक के तरेड़ गांव से ले आए, जहां जमींदार के पुत्र की ससुराल थी। उन दोनों को देखकर जमींदार की आंखों मे आंसू आ गए। जमींदार ने भरे मन से स्वप्न की बातें उन्हें बता दीं। इस पर उनकी पुत्रवधु रुकमणि बोली कि आप परेशान क्यों होते हो पिताजी। यही स्वप्न तो कल उसे मायके में दिखाई दिया था। वह अपना बलिदान देगी। उसकी बात सुनकर उसका पति भावुक होकर कहने लगा कि रुकमणि तुम्हारे बिना उसका व छोटे से नन्हे बालक का क्या होगा ? अपने पति की व्यथा सुनकर, रुकमणि ने उससे कहा कि वह दूसरा विवाह करके अपना वंश चलाए और उसकी सौतन उसके बच्चे का लालन-पालन करेगी।रुकमणि ने कहा कि अब आप अपने मन मे कोई संशय न रखें और बलि की तैयारी करें।आज की पीढ़ियां घराट के बारे में शायद ही जानती हों, लेकिन लोकसाहित्य में आज भी जीवित है घराट, आईए हिमाचली पहेलियों से जानें घराट का इतिहास

प्रदीप गुप्ता, लेखक बिलासपुर निवासी सेवानिवृत्त शिक्षक हैं।


अंत मे रपेहड़ गांव मे कुंड खोदा गया और रुकमणि को खड़ा करके पत्थर व् मिटटी से चीन दिया। जनश्रुति के अनुसार जब पत्थर व मिट्टी की चिनाई उसकी छाती तक पहुंची तो वहां दूध की धरा फुट पड़ी। यह धारा जल में तब बदली जब वह समीप की सतलुज नदी के जल में मिली।
रुकमणि कुंड को देखने के लिए दूरदराज से लोग आते हैं। रुकमणि कुंड मे हर वर्ष वैसाखी का मेला लगता है तथा पुत्र प्राप्ति कि इच्छा से इस कुंड मे स्नान करने के लिए दूर-दूर से विवाहित महिलाएं आती हैं। वे महिलाएं बगड़ घास के परांदे व रिब्बन गूंथ कर मनौती करती हैं। रुकमणि कुंड शांत वातावरण को देखकर प्रकृति कि सुंदरता का आभास होता है। रुकमणि कुंड जाने के लिए भगेड़ से गेहड़वीं या फिर झील के उस पार बेस गांव कल्लर या बहना जात्ता से तीन चार किमी चढ़ाई चढ़ कर इस धार्मिक सथल पार पहुंचा जा सकता है। रोचक यह है कि रुकमणि के मायके तरेड़ गांव के निवासी न तो कुंड में स्नान करते हैं और न ही वे इस कुंड का पानी पीते हैं। आखिर उनके गांव की लड़की ने इस कुंड में  बलिदान जो दिया है।रिसर्च : दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र मलाणा के वासियों के बारे में इतिहासकार छेरिंग दोरजे का शोध, सिकंदर के सैनिकों के वंशज नहीं, इंडो-मंगोलियन


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