एक सोहणी महिवाल लाहौर के अनारकली बाजार में लुट गई या जल मरी, दूसरी जम्मू के युवराज कर्ण सिंह न खरीद ली, तीसरी सोभा सिंह के परिजनों के पास, चौथी रूस के दिल्ली स्थित दूतावास की धरोहर

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एक सोहणी महिवाल लाहौर के अनारकली बाजार में लुट गई या जल मरी, दूसरी जम्मू के युवराज कर्ण सिंह न खरीद ली, तीसरी सोभा सिंह के परिजनों के पास, चौथी रूस के दिल्ली स्थित दूतावास की धरोहर
पालमपुर से विनोद भावुक की रिपोर्ट
वर्ष 1954 में कला पारखी युवराज कर्ण सिंह ने सोभा सिंह की सुप्रसिद्व कलाकृति ‘सोहणी महिवाल’ को खरीदा। मूल प्रति जम्मू कश्मीर के युवराज कर्ण सिंह ने कला दीर्घा की यात्रा के दौरान पांच हजार रूपए में खरीदी थी। ‘सोभा सिंह कला – दीर्घा एवं संग्रहालय’ पुस्तक में में डॉ. हृदयपाल लिखते हैं कि ‘सोहणी महिवाल के प्रकाशानाधीकार कलाकार ने अपने पास रखे, इसको कलाकार ने प्रकाशित करवाया और इस तरह यह तस्वीर घर– घर पहुंची और कलाकर का नाम भी। तब से अब तक उसके रिप्रंट उसी उसी पेंटिंग से प्रकाशित किए जाते रहे है। कला पारखियो का कहना है कि सोभा सिंह के कला संसार को याद रखने के लिए उनकी उत्कृष्ट कृति सोहणी महिवाल ही काफी है। डॉ. कर्ण सिंह मानते हैं कि उनके पास जो तस्वीर है, वह बेहतरीन है और उसका कोई मुकाबला नहीं है।
लाहौर की सोहणी महिवाल जल गई या लुट गई
बताते चलें कि सोभा सिंह ने लाहौर में रहते हुए भी सोहणी महिवाल की एक पेंटिंग बनाई थी। देश विभाजन के समय वह पेंटिंग लाहौर में ही रह गई। बाद में वह सोहणी महिवाल जल गई या लुट गई, कोई पता नहीं। दूसरी सोहणी महिवाल सोभा सिंह के परिजनों के पास है। अंद्रेटा कला दीर्घा में प्रदर्शित सोहणी महिवाल आकार में पहले वाली पेंटिंग से बड़ी है। रंग संयोजन, वेशभूषा, प्रकृति चित्रण में भी फर्क है।एक अन्य सोहणी महिवाल दिल्ली स्थित रूस के दूतावास ने इस प्रेरणा से खरीद ली कि महिवाल का सम्बन्ध युजबेकिस्तान से था।
रीप्रिंट का सिलसिला
पहले- पहल रिप्रिंट जर्मनी से बनवाए ब्लॉक से टाइम्स ऑफ इंडिया की प्रैस से छावाए जाते थे। फिर ये वकील एंड सन्स मुंबई से छपवाए जाते रहे। इस तस्वीर पर उस प्रिंटिंग प्रैस को राष्ट्रीय स्तर पर प्रथम पुरस्कार मिला। इन दिनों यह तस्वीर मेहता ऑफसैट प्रैस नई दिल्ली से प्रकाशित करवाई जा रही है।
अनारकली बाजार का स्टूडियो
लाहौल के अनारकली बाजार में सोभा सिंह का स्टूडियो था। भारत विभाजन के चलते वर्ष 1947 में जब सोभा सिंह को पाकिसतान छोडऩा पड़ा तो उनके 46 साल के जीवन में जुटाई तमाम चीजों को छोड़ कर खाली हाथा पलायन को मजबूर हो पड़ा। तीन सौ बहुमूल्य कृतियां इस विभाजन की भेंट चढ़ गईं।

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