उनके प्रयासों से रक्तदान करने लगीं युवतियां और दृष्टिहीन, ‘उमंग’ लाई जीवन में तरंग, भर दिए उम्मीदों के ‘रंग’, पत्रकार अजय श्रीवास्तव ने उमंग फाउंडेशन गठित कर बदले हालात

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उनके प्रयासों से रक्तदान करने लगीं युवतियां और दृष्टिहीन, ‘उमंग’ लाई जीवन में तरंग, भर दिए उम्मीदों के ‘रंग’, पत्रकार अजय श्रीवास्तव ने उमंग फाउंडेशन गठित कर बदले हालात
शिमला से विनोद भावुक की रिपोर्ट
तीन दशक पहले वरिष्ठ पत्रकार अजय श्रीवास्तव ने शिमला में उस समय रक्तदान जागरूकता को लेकर बीड़ा उठाया था, जब रक्तदान को लेकर कई भ्रांतियां थी और लोग ब्लड डोनेशन से कतराते थे। अजय श्रीवास्तव ने न केवल खुद ब्लड डोनेट करना शुरू किया, बल्कि रक्तदान जागरूकता को लेकर एक आंदोलन भी खड़ा किया। प्रदेश में पहली बार युवतियों के लिए ब्लड डोनेशन कैंप लगाने की बात हो अथया पहली बार दृष्टिहीनों को ब्लड डोनेशन के लिए प्रेरित करने की पहल हो, अजय श्रीवास्तव की भूमिका हमेशा खास रही है। उनकी ही प्रेरणा और प्रोत्साहन के चलते शिमला रक्तदान के इतिहास के कई बिरले रिकॉर्डों का गवाह बना। उन्होंने रक्तदान को एक जनांदोलन बनाने की पहल की।
खुद रक्तदान, जागरूकता के लिए अभियान
अजय श्रीवास्तव स्वयं 90 बार से ज्यादा बार ब्लड डोनेट कर चुके हैं। उनकी संस्था उमंग फाउंडेशन साल में औसतन 14 ब्लड डोनेशन कैंपों का आयोजन कर औसतन 1100 यूनिट ब्लड की व्यवस्था करती है। आपात स्थिति में रोगियों को तत्काल ब्लड की जरूरत पडऩे पर अस्पतालों से आने वाली कॉल पर भी संस्था के वॉलंटियर्स ब्लड डोनेशन के लिए उपलब्ध रहते हैं। उंगम फाउंडेशन रैलियों, पेंटिंग्स और नुक्कड़ नाटकों के माध्यम से रक्तदान जागरूकता के लिए अभियान चलाती है।
मानवाधिकार के पैरोकार
अजय श्रीवास्तव के प्रयासों से सन 2009 में उंमग फाउंडेशन की स्थापना की गई। संस्था विकलांगों खासकर दृष्टिहीनों, मूक- बाधिरों, थैलेसीमिया से पीडि़त बच्चों, कुष्ठ रोगियों और बुजुर्गों के मानवाधिकारों के लिए काम करती है। यह संस्था के ही प्रयासों का उपकार है कि हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय में विकलांगता एवं पुनर्वास अध्ययन केंद्र की शुरूआत हुई है। संस्था के प्रयासों से प्रदेश के कई दृष्टिहीनों को ज्ञान की रोशनी मिली है। उनके हकों के लिए संस्था ने अदालत का दरवाजा भी खटखटाया है।
विकलांगों की वकालत
संस्था हिमाचल के स्कूलों में विकलांग बच्चों के लिए समावेशी शिक्षा प्रदान करने पर जोर दे रही है। विकलांगता अधिनियम पहले प्रदेश में प्रभावी नहीं था। उमंग फाउंडेशन ने विकलांगता अधिनियम, 1995 के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए कानूनी लड़ाई लड़ी। यह संस्था के प्रयासों का परिणाम है कि राज्य सरकार ने विकलांग छात्रों को समावेशी शिक्षा प्रदान करने के लिए प्रदेश के चार स्कूलों को चुना।
बुढ़ापे की लाठी
उंमग फाउंडेशन बूढ़े असहाय लोगों के अधिकारों के लिए अहम भूमिका अदा कर रही है। शिमला के बसंतपुर वृद्धाश्रम की हालत दयनीय थी, जहां मानसिक रोगियों सहित कई बुजुर्गों को बेसहारा छोड़ दिया गया था। संस्था ने कानूनी लड़ाई लड़ी, विधानसभा में मामला उठाया और तत्कालीन राज्यपाल उर्मिला सिंह से इस मामले में हस्तक्षेप करने की मांग की। राज्यपाल के आदेश के बाद प्रकरण की जांच हुई। मानसिक रोगियों को शिमला में भर्ती किया गया। संस्था के प्रयास ने अब इस वृद्वाश्रम की स्थिति सुधर गई है।
आईजीएमसी शिमला में ‘आई बैंक’ की शुरूआत
उमंग फाउंउेशन ने न केवल रक्तदान को लेकर अलख जगाया है, बल्कि संस्था के ही प्रयासों शिमला स्थित आईजीएमसी मेडीकल कॉलेज में आई बैंक की शुरूआत हुई है। संस्था के अध्यक्ष अजय श्रीवास्तव का कहना है कि 11 दिसंबर 2010 को आईजीएमसी में आई बैंक की शुरूआत हुई और अब तक यहां 55 से ज्यादा नेत्र प्रत्यारोपण किए जा चुके हैं। संस्था की ओर से नेत्रदान करने वालों के परिवारों को विभिन्न समारोहों में सम्मानित किया जा चुका है। उमंग फाउंडेशन की ओर से आई डोनेशन को लेकर भी जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है।
थैलेसीमिया पीडि़त बच्चों की प्रतिनिधि संस्था
उमंग फाउंडेशन हिमाचल प्रदेश में थैलेसीमिया पीडि़त बच्चों की प्रतिनिधि संस्था है। संस्था के प्रयासों से ही हिमाचल प्रदेश में थैलेसीमिया पीडि़त बच्चों का प्रामाणिक डाटा उपलब्ध हुआ है। उमंग फाउंडेशन ने 2009 में थैलेसीमिया मुक्त हिमाचल अभियान की शुरूआत की और ऐसे बच्चों के मानवाधिकारों की रक्षा का बीड़ा उठाया। उनका पक्ष सरकार के समक्ष रखा। संस्था यह मांग करती आई है कि थैलेसीमिया पीडि़त बच्चों के लिए आईजीएमसी, टीएमसी और प्रदेश के सभी जिला अस्पतालों में अलग वार्ड की व्यवस्था होनी चाहिए और उन्हें निशुल्क दवाईयां उपलब्ध होनी चाहिए। इसके लिए संस्था अदालत गई, जिसका परिणाम यह रहा कि प्रदेश के सबसे बड़े अस्पताल आईजीएमसी में ऐसे बच्चों के लिए न केवल अलग वार्ड की व्यवस्था हुई है, बल्कि ऐसे रोगियों के लिए मुफ्त दवाईयों की व्यवस्था भी सरकार ने शुरू कर दी है। अजय श्रीवास्तव का कहना है कि थैलेसीमिया पीडि़त बच्चों के लिए हर जिला मुख्यालय पर स्थित सरकारी अस्पताल में अलग वार्ड होने चाहिए। अजय श्रीवास्तव कहते हैं कि उमंग फांउउेशन अपनी अन्य जिम्मेवारियों के बावजूद रक्तदान जागरूकता को लेकर गंभीर है।

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