‘इस ग्रांये देया लम्बरा हो इन्हां छोरूआं जो लेयां समझाई कि बत्ता जांदे सिटी मारदे’ की मशहूर लोकगायिका शांति बिष्ट ने कई भाषाओं में किया गायन

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‘इस ग्रांये देया लम्बरा हो इन्हां छोरूआं जो लेयां समझाई कि बत्ता जांदे सिटी मारदे’ की मशहूर लोकगायिका शांति बिष्ट ने कई भाषाओं में किया गायन

 

शिमला से विनोद भावुक की रिपोर्ट

‘इस ग्रांये देया लम्बरा हो इन्हां छोरूआं जो लेयां समझाई कि बता जांदे सिटी मारदे’ से रातों- रात शिमला रेडिय़ो के साथ साथ कई रेडियो स्टेशनों की चर्चित गायिका रहीं शांति बिष्ट बेशक अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन कई भाषाओं में गाये उनके गीत आज भी उनकी आवाज को ज़िंदा रखे हैं। शांति बिष्ट ने लोक गायन में बड़ा मुकाम हासिल किया। ‘इस ग्रांये देया लम्बरा हो इन्हां छोरूआं जो लेयां समझाई कि बत्ता जांदे सिटी मारदे’ के अलावा ‘लाड़ा भुखा आया, मैं खिचड़ी पकावा’ गीत भी अपने दौर का बेहद पापुलर गीत रहा। उनके गाये भवन भी खूब बजते रहे। अकाशवाणी शिमला से ऐसा लगाव हुआ कि शिक्षिका की नौकरी मिलने के बाद भी जारी रहा। उन्होंने बगांली, आसामी, मराठी, पंजाबी और तमिल में भी गीत गाये। महाभारत सीरियल में युधिष्टर के पात्र से मशहूर हुए गजेंद्र चौहान के यह ‘यह इश्क नहीं आसां’ में दो गीत गाये।

 

स्कूल के दिनों से संगीत का सफर

शांति बिष्ट धर्मशाला से साथ लगते दाड़ी कस्बे से संबंध रखती थीं । स्कूल के दिनों से ही वह सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेती रहीं। स्टेटहुउ मिलने के अवसर पर उन्होंने पहले मुख्यमंत्री वाईएस परमार के सामने अपनी सांस्कृतिक दल के लीडर के तौर पर प्रस्तुति दी है। बीए, जेबीटी और एलटी करने के बाद उनकी शादी मशहूर लेखक/ साहित्यकार जयदेव किरण के साथ हुई और वह शिमला आ गईं। यहां अकाशवाणी से जुड़ कर उनकी गायिकी ने ऊंची उड़ान भरी।

 

संस्कृति के संरक्षण के लिए समर्पण

बतौर भाषा अध्यापिका शांति बिष्ट की पहली नियुक्ति क्यौंथल स्कूल में हुई। बाद में उन्होंने शिमला के लक्कड़ बाजार और पोर्टमोर स्कूलों में अपनी सेवाएं दी । इन स्कूलों में बच्चों के सांस्कृतिक दल तैयार करना उनके जिम्मे होता था। ऐसे ही सांस्कृतिक दलों के साथ उन्होंने देश के कई शहरों में सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लिया । उन्होंने हजारों स्टूडेंट्स और टीचर्स को इसके लिए ट्रेंड किया।

 

गीतों में ज़िंदा आवाज

9 अगस्त 2020 की सुबह 76 साल की उम्र में उनका देहावसान हो गया। यह वरिष्ठ लोक गायिका पक्षघात का शिकार हुईं थीं। वे दिल के रोग से भी पीडि़त थी। जो आवाज कभी लाखों दिलों की धडक़न रही थी, करीब एक साल से खामोश थी। उनके के उपचार में परिवार ने हर संभव प्रयास किए हैं, लेकिन उनकी हालत ओर बिगड़ती गई और और चेहरा भी मुड़ऩे लगा था। गीतों में शान्ति की आवाज आज भी जिन्दा है।

 

 

 


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