इतिहास की कई यादें संजाये है बेजा ठकुराई का कोटबेजा किला, कभी 13 वर्ग किलोमीटर में 45 गांवों तक थी ठकुराई

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इतिहास की कई यादें संजाये है बेजा ठकुराई का कोटबेजा किला, कभी 13 वर्ग किलोमीटर में 45 गांवों तक थी ठकुराई
चंडीगढ़ से वीरेंद्र शर्मा ‘वीर’ की रिपोर्ट
चलो आपको लेकर चलते हैं बेजा ठकुराई (रियासत) के कोटबेजा किले में। बेजा ठकुराई के टीका विजयचंद अपने परिवार सहित यहीं रहते हैं। पिछले पंचायती राज चुनावों में परिवार के सदस्य कंवर अजय सिंह जिला परिषद सदस्य चुने गए हैं। कभी कोटबेजा कई पंचायतों का केंद्र रहा है। परवाणु कसौली के मध्य कोटबेजा क्षेत्र में एक वरिष्ठ माध्यमिक स्कूल है, जिसे कोजबेजा किले के एक हिस्से में पाठशाला के रूप में साल 1946 राजपरिवार द्वारा शुरू किया गया था। साल 1966 प्राइमरी पाठशाला का दर्जा मिला और सरकार ने अपने आधिपत्य में ले लिया। साल 1985 में इसे हाई स्कूल का दर्जा मिला और साल 2006 वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय बनाया गया। सदियों पुराने इस राजमहल और किले का एक हिस्सा गिर चुका है। यह पुरातन इमारत अपने वजूद और वैभव को किसी तरह बचाए हुए है।
कसौली पहाडिय़ों की पश्चिमी ढलान पर स्थित
विश्व प्रसिद्ध पर्यटन स्थल कसौली अपनी खासियतों की वजह से लोगों की जुबान पर है। शिवालिक पहाड़ी श्रृंखला में बसा कसौली कस्बा मैदानी क्षेत्रों से जाने वाले पर्यटकों के लिए मानो किसी स्वर्ग से कम नहीं है। यहां पर जहां एक ओर प्रकृति ने खूबसूरत‌ छटा बिखेरी है, वहीं अंग्रेजी हुकूमत के समय मे स्थापित कैंट एरिया, मिलिट्री अस्पताल, सनसैट प्वाइंट, होटल , चर्च सबकुछ है। यह स्थान चर्चित लेखकों खुशवंत सिंह व रस्किन बांड का निवास रहा है। इस सब के अलावा कसौली पहाडिय़ों की पश्चिमी ढलान पर 13 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र और 45 गांव में बसी बेजा ठकुराई (रियासत) का कोटबेजा गांव एक लंबे इतिहास को संजोए हुए है।
तंवर वंशीय राजा ढोलपाल ने की स्थापना
बेजा रियासत की स्थापना दिल्ली के साथ लगती एक रियासत के तंवर ( तोमर) वंशीय राजा ढोलपाल के वंशज ने की थी। इस कुल की 37 पीढ़ी में संसार शमशेर चंद बाहरवीं या तेहरवी शताब्दी में दिल्ली से आकर हरिद्वार के निकट कनखल में बस गया। उसके पौत्र रामचंद्र ने अपने समय में कई बार सिरमौर रियासत में प्रवेश करने का प्रयत्न किया, परंतु हर बार विफल रहा। बाद में उसने किसी पहाड़ी क्षेत्र को उसने अपना निवास स्थान बनाया और कई मंदिर भी बनाए, आगे चलकर 43 वीं पीढ़ी में उसके पौत्र या पड़पौत्र गर्व चंद ने बघाट रियासत में स्थित भोच (बोहच) नामक गांव के स्थानीय राणा पर आक्रमण किया और उसके ठाकुराई को हथिया लिया और धीरे-धीरे शक्तिअर्जित करके बेजा परगना क्षेत्र पर भी अधिकार कर लिया ।इस प्रकार राजा गर्व चंद लगभग सन 1350 में बेजा का पहला शासक बना।
28 राजाओं ने किया राज
इस रियासत की सीमा मैदान की तरफ से पटियाला, पट्टा महलोग, कुठाड़ रियासतों के साथ लगती थी। संभवतया इस रियासत का किला दो नदियों के बीच होने के कारण कोट और रियासत में अदरक का बीज भरपूर होने के कारण इसका नाम कोटबेजा पड़ गया। राजा गर्व चंद्र का पौत्र बिशन चंद एक कठोर शासक था। फलस्वरूप उसके शासनकाल में बहुत से विद्रोह हुए और उसके हाथ से कुछ क्षेत्र निकल गए। यह रियासत कहलूर के अधीन भी रही, लेकिन 1790 में जब हिंडूर के शासक ने कल्हूर पर आक्रमण किया तो बेजा ठकुराई फिर आज़ाद हो गई। इस रियासत पर कुल 28 राजाओं ने राज किया। इसके अंतिम शासक लक्ष्मीचंद रहे। देश के आज़ाद होने के बाद रियासत का विलय भारतीय गणतंत्र में हो गया। 15 अप्रैल 1948 को यह रियासत भी हिमाचल के जिला सोलन का हिस्सा बन गई।
गोरखों के खिलाफ अंग्रेजों का साथ
गोरखा एंग्लो युद्ध के दौरान गोरखों के आक्रमण के समय बेजा रियासत पर 24 वां मानचंद गद्दीनशीन था, जो कि वीर योद्धा होने के साथ आयुर्विज्ञान का भी अच्छा ज्ञाता था। उसने मानवता का परिचय देते हुए गोरखा सेनापति अमर सिंह थापा की जख्मी सेना के अधिकारियों का इलाज किया, जिससे खुश होकर गोरखा सेना ने बेजा ठकुराई को सनद देकर अपने अधिकार से मुक्तकर दिया। गोरखों का व्यवहार आम समाज के साथ भी अत्याचार भरा था, इसलिए राजा मान सिंह ने अंग्रेजी सेना का साथ दिया। सन 1815 में गोरखा सेना को हराने के बाद शासन के सारे अधिकार बेजा ठकुराई के राजा मान सिंह को लौटा दिए। साल 1842 में अंग्रेजी हुंकूमत द्वारा बेजा ठकुराई से कुछ हिस्सा कसौली छावनी में मिलाने के कारण 80 रुपये वार्षिक शुल्क बेजा ठकुराई को मिलता रहा। बेजा ठकुराई की निजि कमाई करीब 3000 रुपये थी।
पिछड़ गया कोटबेजा रियासत का क्षेत्र
भरौली मार्ग के नाम से प्रसिद्ध स्थान पर स्थित ये स्थान कसौली / धर्मपुर और परवाणु दोनों ओर से ये क्षेत्र सडक़ मार्ग से जुड़ा हुआ है, पर खस्ताहाल‌ ही हैं। आज कोटबेजा रियासत मात्र एक पंचायत क्षेत्र बनकर रह गई है। बेजा क्षेत्र अन्न व अन्य सब्जियों के उत्पादन के लिए भी जाना जाता रहा है, लेकिन किसानों को मंडी न होने के कारण चंडीगढ़ फसल बेचने जाना पड़ता है। इस क्षेत्र के निवासियों को उच्च शिक्षा के लिए सोलन अथवा चंडीगढ़ की राह पकडऩी पड़ती है।

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