आज़ादी का अमृत महोत्सव : छात्राकाल में जगी क्रांति की अलख, क्रांतिकारियों के लिए जुटाया धन, घर छोड़ संगठन में हुई शामिल, आज़ाद के बाद बनी चीफ इन कमांडर प्रकाशवती ने जेल में किया था क्रांतिकारी यशपाल के साथ विवाह

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नादौन से अतुल अंशुमाली की रिपोर्ट

27 फरवरी 1931 को एल्फेड पार्क, इलाहाबाद में ब्रिटिश पुलिस की मुठभेड़ में क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद शहीद हो गये। उसके कुछ दिन बाद ही इलाहाबाद में पुलिस के साथ मुठभेड़ में यशपाल भी पकड़ लिये गये। इसके बाद क्रांतिकारी संगठन की कमांडर इन चीफ बनकर एक महिला ने गतिविधियों को आगे बढ़ाया। जून 1934 को वह भी दिल्ली से गिरफ्तार कर ली गई। यह महिला थीं क्रांतिकारी यशपाल की पत्नी प्रकाशवती कपूर। गदर के इतिहास में यह विरला उदाहरण है जिसमें पति-पत्नी ने देश को आज़ाद करवाने की लड़ाई लड़ी और ब्रिटिश हकूमत के खिलाफ आवाज़ उठाने पर जगह-जगह भटकना पड़ा, जेल भी जाना पड़ा। रिहाई के बाद बंदूक से क्रांति का आग़ाज करने वाले इस दंपती ने बाद में कलम की धार से आज़ादी की लड़ाई जारी रखी।  आज़ादी का अमृत महोत्सव : रानी ने राजपाठ ठुकराया, क्रांति का बिगुल बजाया ; स्वतंत्रता आंदोलन में कूदने वाली रानी खैरगढ़ी पहाड़ों की पहली महिला, लाला लाजपत राय के क्रांतिकारी दल की बनी संरक्षक

अध्यापिका से पूछा कैसे मिलेगी आज़ादी, फिर खुद लड़ाई में कूदी
यह वाकया है लाहौर के एक कन्या विद्यालय का जहां प्रकाशवती पढ़ती थीं। उन्होंने अध्यापिका प्रेमवती से कक्षा में प्रश्न किया कि देश का आज़ादी कब मिलेगी, लेकिन उस वक्त अध्यापिक के उत्तर से प्रकाशवती संतुष्ट नहीं हुईं। प्रकाशवती और उसकी सहेली लज्जादेवी ने एक दिन फिर फुरसत के समय अपनी अध्यापिका प्रेमवती से यह विषय छेड़ दिया तो उन्होंने उसकी जिज्ञासा को भांपकर बताया कि कैसे क्रांतिकारी लोग सक्रिय हैं और लाहौर में उन्हें बम बनाने और शस्त्र संचालन का प्रशिक्षण दिया जाता है। इन सब कामों के लिए बस आवश्यकता है धन की।आज़ादी का अमृत महोत्सव : शहीदे-आज़म भगत सिंह, सुखदेव और भगवती चरण की दोस्ती ने यशपाल के अंदर क्रांति की मशाल जलाई, बंदूक और कलम से लड़ी आज़ादी की लड़ाई 

सहेलियों का दल बना धन एकत्रित कर क्रांतिकारियों को भेजा
जब अध्यापिका प्रेमवती से प्रकाशवती को पता चला कि आज़ादी की लड़ाई लड़ने वाले क्रांतिकारियों को धन की आवश्यकता है तो उन्होंने सहेलियों का एक दल बनाया जो धन एकत्रित करता और प्रेमवती के माध्यम से क्रान्तिकारियों तक पहुंचा दिया जाता था। असल में अध्यापिका प्रेमवती भी क्रांतिकारियों से जुड़ी थीं। प्रकाशवती के मन में भी क्रांतिकारी दल में शामिल होने के विचार जागे और अध्यापिका प्रेमवती के सामने प्रकट किए। प्रेमवती ने उसे एक पत्र देकर क्रांतिकारी यशपाल से मिलने के लिए कहा। असेंबली में बम कांड के बाद यशपाल फरार थे और वे लाहौर में थे। वह यशपाल से मिलीं और अपने दिल की बात कही। प्रकाशवती के पिता इन सब बातों से दूर रखने के लिए उसकी शादी की तैयारी कर रहे थे लेकिन वह घर छोड़कर क्रांतिकारी दल में शामिल होने के लिए चली आई थी।स्पेशल रिपोर्ट : भारत के स्वतंत्रता संग्राम में हिमाचल प्रदेश की वीरांगनाओं की वीरता के अनूठे प्रेरक प्रसंग, चाहिए थी आजादी, रण में उतरी ‘आधी आबादी’

यशपाल ने मिलाया आज़ाद व भगत सिंह से
यशपाल ने प्रकाशवती को अपने क्रांतिकारी साथियों से मिलवा दिया और उसे दल में सम्मिलित करने की अनुमति मिल गई। प्रकाशवती को पहले तो क्रांतिकारी गतिविधियों एवं उसके तौर-तरीकों का प्रशिक्षण दिया और फिर गोपनीय परचे बांटने का काम सौंपा गया। दिल्ली में बम बनाने की फैक्टरी खोली गई। यशपाल को बम बनाने का काफी अनुभव हो चुका था। प्रकाशवती के साथ यशपाल को दिल्ली भेज दिया गया। प्रकाशवती के ठहरने की व्यवस्था महाशय कृष्ण के घर पर की गयी। इस प्रकार बम फैक्टरी में काम करते-करते प्रकाशवती भी दक्ष हो गईं।आजादी का अमृत महोत्सव : विक्टोरिया पुल को उड़ाने की थी योजना, गदर पार्टी के क्रांतिकारियों में मियां जवाहर सिंह आंदोलन को धार दी, अपने बेटे बदरी को भी क्रांतिकारी का पहनाया बसंती चोला

पुलिस ने की घेराबंदी लेकिन पकड़ नहीं पाई
दिल्ली असेंबली में बम विस्फोट के कारण भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त लाहौर जेल में थे। चन्द्रशेखर आजाद ने भगतसिंह को छुड़ाने के लिए यशपाल को दिल्ली से लाहौर भेज दिया। प्रकाशवती दिल्ली में ही रहीं। बम विस्फोट के कारण क्रांतिकारी भगवती चरण वोहरा की मृत्यु हो गई थी। लाहौर की बहावलपुर कोठी में बम फट जाने के फलस्वरूप भगतसिंह को छुड़ाने की योजना विफल हो गयी। यशपाल ने प्रकाशवती को अपने साले ध्रुवदेव के नाम से पत्र लिखा, लेकिन वह  पत्र पुलिस के हाथ लग गया और ने प्रकावती को पकड़ने के लिए महाशय कृष्ण के घर की घेराबंदी कर दी, लेकिन वह वहां से निकलकर ख्यालीराम गुप्त के घर पहुंच गईं।भगत सिंह को फांसी वाले रोज़ लाहौर जेल में कैद थे “भगत राम’, 16 साल की उम्र में क्रांति के लिए कविता पढ़ने पर अंग्रेजी हुकूमत की आँखों की किरकिरी बनने वाले स्वतंत्रता सेनानी लाला भगत राम कड़ोहता के बलिदान को भूला पहाड़

आज़ाद के शहीद और यशपाल पकड़े जाने के बाद संभाली संगठन की कमान
दिल्ली बम विस्फोट का पुलिस को पता चल गया और अनेक लोग गिरफ्तार भी हो गए और कई लोग इधर-उधर भाग गए। प्रकाशवती को अब कानपुर में चन्द्रशेखर आजाद के पास पहुँचा दिया गया। आजाद ने प्रकाशवती को निशाना लगाना सिखा दिया जिसमें वे काफी अभ्यस्त हो गईं। आजाद की प्रेरणा से उन्होंने अपना अंग्रेजी का ज्ञान बढ़ाया और स्वास्थ्य की दृष्टि से व्यायाम इत्यादि भी करने लगी। 27 फरवरी 1931 को एल्फेड पार्क, इलाहाबाद में  पुलिस मुठभेड़ में आज़ाद के शहीद होने के कुछ दिन बाद ही इलाहाबाद में ही यशपाल भी पकड़े गये। प्रकाशवती ने खुद को संभाला और क्रांतिकारी की चीफ इन कमांडर बनकर गतिविधियां जारी रखीं लेकिन जून 1934 में प्रकाशवती को भी दिल्ली से गिरफ्तार कर लिया गया।कारगिल दिवस विशेष : देश से मोहब्बत, लिख दी शहादत हिमाचल प्रदेश की मिट्टी में पीढ़ी-दर-पीढ़ी जिंदा है फौजी वर्दी के लिए जुनून

जेल में हुई शादी, रिहाई के बाद कलम से शुरू की लड़ाई
यशपाल और प्रकाशवती की शादी का वाकया दिलचस्प है। 1936 में यशपाल बरेली जेल में थे। जेल अधीक्षक मेजर मल्होत्रा अचानक यशपाल के पास जाकर पूछते हैं कि क्या वे मिस प्रकाशवती कपूर को जानते हैं? जी हां! जानता हूं। आप यह क्यों पूछ रहे हैं? मेजर मल्होत्रा ने यशपाल को बताया कि मिस प्रकाशवती कपूर ने डिप्टी कमिश्नर के माध्यम से बरेली जेल में आपके साथ विवाह करने का प्रार्थनापत्र दिया है। इस तरह यशपाल की सहमति लिखित रूप में प्राप्त कर बरेली जेल को अदालत के रूप में परिणत कर डिप्टी कमिशनर मि. पैडले और गवाहों की उपस्थिति में यशपाल और प्रकाशवती का विवाह संपन्न हुआ, उस समय यशपाल की माँ भी उपस्थिति थीं। इस तरह प्रकाशवती कपूर प्रकाशवती पाल हो गयीं। रिहाई के बाद प्रकाशवती ने पति यशपाल के साथ ‘विप्लव’ पत्रिका का प्रकाशन व संपादन किया। बंदूक के बाद दोनों ने कलम की धार से आज़ादी के लिए लड़ाई जारी रखी। यह सत्य है कि प्रकाशवती को क्रांतिकारी बनाने वाले यशपाल थे तो यह भी निर्विवाद सत्य है कि यशपाल को लेखक बनाने में प्रकाशवती का योगदान है और वे सफल लेखक बन सके।  काळे बाबे जो हंडाया, ,कल्हूरी दा मान बढ़ाया : स्वतंत्रता सेनानी कन्हैया लाल दबड़ा दा बिलासपुर लेखक संघ ने रेहया गहरा लगाव


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