आज़ादी का अमृत महोत्सव : एक आयरिश लेडी ने नाटकों में भारतीय संस्कृति को उभारकर ब्रिटिश हुकूमत को दी थी चुनौती, दिल में भारत के लिए प्रेम लेकर इंग्लैंड से लौट आईं नोरा रिचर्ड्स ने कांगड़ा के अंद्रेटा में किया बसेरा, यहीं नाटकशाला बनाकर ग्रामीणों को दिया अभिनय का प्रशिक्षण, इनकी ख्याति से प्रभावित होकर महान अभिनेता पृथ्वीराज कपूर और बलराज साहनी भी आये थे अंद्रेटा  

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कांगड़ा से अतुल अंशुमाली की रिपोर्ट

नोरा रिचर्ड्स एक ऐसी आयरिश लेडी, जिसने ब्रिटिश शासन का विरोध किया और भारत की संस्कृति को अपने नाटकों में दर्शा कर क्रांति की मशाल जगाई। वह डॉ एनी बेसेंट के  थियोसोफिकल आंदोलन और होम-रूल आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल थीं। पति की मृत्यु के बाद वह इंग्लैंड चली गई, लेकिन भारतीयता में वो इतनी घुलमिल गई थी कि भारत लौट आईं और कांगड़ा के अंद्रेटा में घर बनाया। अपने घर में ही  खुद घास फुस का छत डालकर एक खुला थियेटर बनाया, जहां वह ग्रामीणों को लोक नाटकों में अभिनय का प्रशिक्षण देने लगीं। कला के चाहने वालों के लिए नोरा का घर कला का मंदिर बन गया था। 1876 में आयरलैंड में जन्मीं नोरा एक अभिनेत्री थीं। थिएटर की दुनिया में उनका नाम बड़े अदब से याद किया जाता है। 60 साल उन्होंने पंजाब (जिसमें उस समय आज के हिमाचल का बड़ा हिस्सा शामिल था) में थिएटर को मजबूत करने का काम किया। आज़ादी का अमृत महोत्सव : बम विस्फोटक सामग्री जुटाकर क्रांतिकारियों तक पहुंचाने वाले ब्रिटिश हुकूमत की आंखों की किरकिरी थे सिद्धु खराड़ा , खौफ से  इस क्रांतिकारी को सजा सुनाने वाले जज का किया था तबादला

पति के साथ 1911 में पहली बार भारत आई
प्रख्यात आयरिश नाटककार नौरा रिचर्ड अपने पति के साथ 1911 में पहली बार भारत आई थीं। उनके पति फिलिप एर्नसट रिचर्ड दयाल सिंह लाहौर के कॉलेज में अंग्रेजी के प्राध्यापक थे। नोरा रिचर्ड्स कॉलेज में सांस्कृतिक गतिविधियों में शामिल हो गईं और कई नाटकों का उन्होंने मंचन करवाया।  लाहौर उन दिनों पंजाबी संस्कृति का घर था। उस दौरान नोरा ने कई पंजाबी नाटकों का निर्देशन किया। सन् 1920 में अपने पति के आकस्मिक निधन के बाद नौरा रिचर्ड इंग्लैंड लौट गईं। वह भावनात्मक रूप से भारत की माटी से स्वयं को अलग नहीं कर पाईं। भारत में कला-संस्कृति और विशेषकर ग्रामीण थियेटर को बढ़ावा देने का सपना बराबर उनकी आंखों में पलता रहा। अपने भारत प्रवास के दौरान नौरा रिचर्ड ने ‘सती’ और ‘भारतवर्ष’ नामक दो नाटक लिखे थे, जो इंग्लैंड के रंगमंच पर काफी चर्चित हुए। भारत में भी कुछ कलाकारों ने जब इन नाटकों का मंचन किया, तो नौरा रिचर्ड सुर्खियों में आ गईं।आज़ादी का अमृत महोत्सव : ‘सिंध के गांधी’ वतन को आजाद करवाने की हसरत में मंडी के हरदेव ने छोड़ी अध्यापक की नौकरी, अमेरिका से जापान ओर फिर शंघाई पहुंचकर गदर पार्टी में हुए शामिल, 1914 में आजादी का सपना लेकर लौटे भारत

नोरा रिचर्डस का घर व संपत्ति जिसकी देखभाल पंजाबी विश्वविद्यालय पटियाला के पास है।

भारत लौटी तो 1935 में अंदे्रटा आईं
प्रख्यात आयरिश नाटककार नौरा रिचर्ड 1935 में अंदे्रटा आईं। उनकी एक भारतीय प्रशंसक ई. डब्ल्यू. पार्कर ने उन्हें अंदरेटा में भूमि उपहार में देकर यहां सांस्कृतिक केंद्र के रूप में विकसित करने का न्यौता दिया। नौरा रिचर्ड ने यहां मिट्टी का घर बनाया। उन्होंने अपने घर का नाम उन्होंने रखा- चमेली निवास। यह बसेरा नाट्य प्रेमियों के लिए कला-मंदिर बन गया। घर के आंगन में घास-फूस की छत डालकर उन्होंने एक खुला थियेटर बनाया और बाकायदा कक्षाएं लगाकर गांव के लोगों को लोक-नाटकों में अभिनय का प्रशिक्षण देने लगीं। उन्होंने यहां वार्षिक रंगमंच का आयोजन करना भी शुरू किया ।आज़ादी का अमृत महोत्सव : ‘जन मण गन’ राष्ट्रीय गान के बजने पर पूरा भारत देशभक्ति के रंग में डूब जाता है, धर्मशाला के खनियारा गांव से थे इसकी धुन के रचयिता कैप्टन राम सिंह ठाकुर

पृथ्वीराज कपूर और बलराज साहनी जैसे कलाकार आया करते थे
नोरा के खुले में खोले नाटकशाला में उनके स्टूडेंट गांव वालों के सामने नाटक करते थे। पृथ्वीराज कपूर और बलराज साहनी जैसे बड़े नाम भी यहां आया करते थे। बाद में प्रोफेसर जय दयाल, चित्रकार शोभा सिंह और फरीदा बेदी जैसे लोग जो नोरा के दोस्त थे, जो बाद में वुडलैंड एस्टेट के पास बस गए । जिस दौर में अंग्रेज और अंग्रेजीदां भारतीय यहां की परंपराओं का मजाक उड़ाया करते थे, नोरा अपने नाटकों के जरिये उन परंपराओं और मान्यताओं का समर्थन करती थीं। उन्होंने नाटकों के जरिये समाज में फैली बुराइयों को दूर करने का भी काम किया। नोरा के स्कूल से कई नाटककार उभरे, जिनमें ईश्वर चंद नंदा , डॉ हरचरण सिंह, बलवंत गार्गी और गुरचरण सिंह नाम शामिल हैं। अपनी मृत्यु तक नौरा रिचर्ड 4 मार्च, 1971 तक यहीं रहीं और नाटकों के जरिये भारतीय संस्कृति को उभारती रहीं। मृत्यु के बाद जहां नोरा रहतीं थी उसी घर के पास उनकी याद में समाधि बनाई गई है, जिसके पत्थर पर ये शब्द अंकित हैं “रेस्ट वेरी हार्ट – तेरा काम हो गया।” आज़ादी का अमृत महोत्सव : रानी ने राजपाठ ठुकराया, क्रांति का बिगुल बजाया ; स्वतंत्रता आंदोलन में कूदने वाली रानी खैरगढ़ी पहाड़ों की पहली महिला, लाला लाजपत राय के क्रांतिकारी दल की बनी संरक्षक


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