अमेरिका में बिलासपुर : विदेश में रहते हुए हिंदी साहित्य के सृजन में लगीं हैं डॉ. अमिता तिवारी

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फोकस हिमाचल की बिलासपुर से रिपोर्ट

अमेरिका के मैरीलैंड विश्वविद्यालय में अनुसन्धान प्रोजेक्ट पर कार्यरत बिलासपुर जिला के छोटे से गांव बड़ोआ की डॉक्टर अमिता एक दशक में परदेश में रहते हुए अपनी सांस्कृतिक जड़ों से गहरे जुड़ी हैं।  हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिला के छोटे से गांव बड़ोआ में जन्मी डॉ अमिता
शिमला विश्वविद्यालय से अध्ययन व अध्यापन और भारतीय उच्चतर अध्ययन संस्थान शिमला में शोध किया। वह एक दशक से परदेश में निवास कर रही हैं, लेकिन अपनी मिट्टी अपनी संस्कृति की जड़ों से जुड़ी हुईं हैं। वह अमेरिका में रहती हुईं हिंदी साहित्य का सृजन कर रही हैं।  अभी तक उनका एक कहानी संग्रह, दो कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। इसके अलावा काव्य -पाठन मंचों  पर वह अपनी रचनाएं प्रस्तुत कर चुकी हैं और  ई- प्रकाशनों में छिटपुट प्रकाशन जारी है। वह सोशल मीडिया पर भी सक्रिय रहती हैं। उनकी हिंदी में लिखी कविताओं को सोशल मीडिया पर भी पढ़ा जा सकता है। उनकी कविताओं में नारीशक्ति का आह्वान और जागृति का प्रभाव दिखाई देता है। वहीं परदेश में रहते हुए अपने वतन की स्मृति और गांव की यादों का उल्लेख मिलता है। आईए उनकी कुछ कविताओं से रू-ब-रू होते हैं। कांगड़ा में बनी मूर्तियां, ऑस्ट्रेलिया- कनाडा में डिमांड : शाहपुर की करेरी पंचायत  के कांशी बौंथल ने बिना किसी प्रशिक्षण के मूर्ति कला में हासिल की दक्षता, कला के दम पर हासिल किया मुकाम

(रामचरित मानस में सीता हरण का वर्णन आता है। सीता को रावण छल से हरण करने आया। सीता ने सहायता के लिए परमेश्वर पति राम को, शक्तिशाली देवर लक्ष्मण को और सभी देवी देवताओं को पुकारा, लेकिन कोई भी सीता की सहायता नहीं कर पाए।
सीता का हरण हो गया। सीता के सत के ताप से भी रावन झुलसा नहीं। आखिर सीता रावण की नगरी पहुंच गयी। अब तो उसे किसी से मदद मिलने की कोई सम्भावना ही नहीं रह गयी। अदम्य आदमखोर रावण, अकेली लाचार सीता के पास बलप्रयोग के लिए आ पहुंचा। सीता ने समझ लिया की अब जो कुछ करना है स्वयं ही करना है। सो बिना डरे सम्पूर्ण साहस के साथ एक तिनका उठाया और गरज कर कहा कि यह तिनका मेरी समस्त शक्ति का संकलित पुंज है। अगर मुझ पर बलप्रयोग का दुसाहस करोगे तो मैं इस तिनके से जलाकर राख कर दूंगी।
    रावण ने सीता का यह चंडी रूप देखा तो डर गया निरंकुश दुसाहसी शासक अपनी ही राजधानी में एक असहाय अपृहता से हार गया। यह कविता उसी तिनके के प्रति है। )प्रेरक – मिलिए हिमाचल प्रदेश के इकलौते अधिवक्ता से जो 23 सालों से हिंदी में कर रहे प्रेक्टिस, हाईकोर्ट में हिंदी को मान्यता के लिए संघर्ष कर रहे सुंदरनगर के नरेन्द्र शर्मा अदालत में लगाते हैं हिंदी के माथे पर बिंदी, देश की अदालतों में अभी तक है राष्ट्रीय भाषा से पक्षपात

सीता ओर बस एक तृण
सीता के सत के रखवाले तृण
तू केवल अशोक वाटिका में
क्यों उगा ?
जनक दुलारी जानकी,
दशरथ कुलशीला
नहीं तुझसे भी
कोई शिकवा या गिला
कि मात्र एक तृण से
सुरक्षित रह गयी
यह तृण तुम्हारा एकमात्र ढाल
कैसे कर पाया इतना कमाल
स्वयंभू त्रिपति राम अशेष
लक्ष्मण से भ्राता
देव रक्षित पंचवटी
वीर जटायु से ज्ञाता
कोई भी सीता तुम्हे
रावण से बचा नहीं पाए
और वही काम
इस तिनके ने कर दिखाए
यह तृण तुम्हारा एकमात्र ढाल
कैसे कर पाया इतना कमाल
नहीं मंत्र रक्षित नहीं देव प्रेषित
चिरप्रतीक्षित वरदान नहीं
तंत्र मंत्र अभियान नहीं
पूर्व जन्म कर्म परिणाम नहीं
फिर भी यह तृण
तुम्हारा एकमात्र ढाल
कैसे कर पाया इतना कमाल
शायद इसलिए
कि सीता जब तक राम
लक्ष्मण के सहारे रहती जाती है
वो किसी न किसी रावण के
द्वारा हर ली जाती है
और जब वो स्वयं रक्षा हित
स्वंय अपने हाथ में
एक तिनका भी उठा लेती है
तो कोई भी युग हो
कैसा भी रावण
उस की शक्ति
धरी की धरी रह जाती हैस्मार्ट सिटी धर्मशाला के अंदर मौजूद है ‘मिनी ल्हासा’ और ‘तेल अबीव’:  धर्मशाला शहर जितनी नहीं प्रदेश के किसी दूसरे शहर में खूबियां, आप भी जानिए क्या खास है प्रदेश की पहली स्मार्ट सिटी में

ये जो है लड़की
ये जो है लड़की
हैं उसकी जो आखे
हैं उनमें जो सपने
जागे से सपने
भागे से सपने
सपनों में पंख
पंखों में परवाज
बंद खामोशी में
पुरजोर आवाज
आवाज में वादा
बहुत सच्चा,
बहुत सीधा सादा
कि मुझे आसमान दे दो
छोटा सही
इक जहान दे दो
बदले में देती हूं वादा कि  
अकेली आसमान नहीं
ओढ़ूंगी
ओढ़ ही नहीं पाऊंगी
ऐसी ही बनी हूं मैं
सवंय को
छोड़ ही नहीं पाऊंगी

मेरी उड़ान में
सारा जहां उड़ पायेगा
जब जब थकेगा जहान
मेरे आंचल में
दुबक आएगा
मत डरो, मत घबराओ
कि मुझे पंख मिले तो
मैं पता नहीं
क्या कर जाऊंगी
तुमसे आगे कहीं
दूर निकल जाऊंगी
तुम्हारे अंगना में
देहरी में नहीं समाऊंगी
मुझे आसमान दे दो
छोटा सही इक जहान दे दो
बदले में देती हूं वादा
कि अकेली आसमान नहीं
ओढ़ूंगी
ओढ़ ही नहीं पाऊंगी
ऐसी ही बनी हूं मैं
सवंय को
छोड़ ही नहीं पाऊंगी

मेरे भाई
राखी ले के  
बहना तेरे ही पास आयेगी
मेरे बाबा
ये बेटी आसमान से

उतर के आयेगी
तो भी तेरे ही अंगना में
नन्ही बन इतराएगी
मेरे सैंया
तुम्हारे भी संग संग उडूंगी
हिमालय पर तुम संग
पावों जड़ूंगी
समंदर के तल तक
 तैरती जाऊंगी
अनुछुई अनखुली सीपी
ले आंऊगी
तुम संग मिल कर
गूंथूंगी माला
नन्ही को तुम संग
मिल के पहनाऊंगी
आधी आबादी हूं पर
सच्च ये पूरा है
समूची धरा बिन
ये अंबर अधूरा है
सच कहती हूं
मुझे आसमान दे दो
छोटा सही इक जहान दे दो
बदले में देती हूं वादा
कि अकेली आसमान नहीं
ओढ़ूंगी
ओढ़ ही नहीं पाऊंगी
ऐसी ही बनी हूं मैं
स्वयं को
छोड़ ही नहीं पाऊंगीनिग्गर : ‘बॉब ईटन’ अमेरिकी पहाड़िया , कांगड़ी बोलणे वाळेे अमरिकी माहणुए ने राजीव त्रिगर्ती कन्ने भूपेंद्र जम्वाल ‘भूपी’ दी सिद्दी गल्ल- बात

हम भी होली खेलते जो होते अपने देश

हम भी होली खेलते जो होते अपने देश
विधि ने ऐसा वैर निकला भेज दिया परदेश

भेज दिया परदेश लेकिन भेजी न सोगातें
अपने हिस्से में बस आई भूली बिसरी बातें

यहां तो होली शनि रवि को शनि रवि दीवाली रातें
बासी रोटी बर्फ निवाले नाचें तब जब विदा बाराते

अनुमति लेकर रंग लगाना, ये भी कोई रंग लगाना
बांच के रंग की जन्मपत्री, डरे डरे से हाथ बढ़ाना
 
फीसें दे दे नाच सीखना, नपा तुला सा पैर उठाना
जड़ों से हम भी जुड़े हैं ,सोच के स्वंय को धीर बंधाना

होली की सौगात तुम्हे शुभ, रंग हमारा भी ले लेना
रहे बधाई दीवाली की,  दीप भी तेरा तेरी रैना

राम वहां बनवास से आयें, हम भी दीपक यहां जलायें
भेजो कुछ हुडदंग की पाती हम भी सुन सुन रंग में आयेंइतिहास का ‘नगीना’, पठियार का ‘लखीना’ : मौर्यकालीन ब्रह्मी एवं खरोष्ठी लिपि में लिखित 2200 वर्ष पुराने ऐतिहासिक शिलालेख को समझने की कोशिश

मेरे गांव के घर में
मेरे गांव के घर में
एक छोटा द्वार था
जिससे आ जाया करते थे पाहुने
नाते के रिश्ते के जाने अनजान
घर के गांव के और मेहमान
उसी दरवाजे से आते थे
गांव के बच्चे
लस्सी लेने
खबरें देने
कि किसकी गाय ने
भूरा या कि काला जाया है
और कि रतिया की ससुराल से
कौन आया है
खबर ये भी कि रतिया की रसोई में
धुंआ है
पकवानों की बारी है
रतिया के ससुराल जाने की
तैयारी है
इसी द्वार से आई थी मां
नई दुल्हन बन कर
सज धज कर सपने चुन कर
हल्दी लगी हथेली
दीवार भर छापी थी
गज भर भर आंचल से
देहरी नापी थी
इसी द्वार पर मां ने मेंहदी रचे पावों
अनाज भरा कलसा पलटाया था
गांव घर की सुहागिनों ने सुर से
सुख सौभाग्य का गीत गाया था
छोटी सी मां बड़े घर की
बड़ी बहू हो गयी थी
दुनिया बसाने में
सम्पूर्ण खो गयी थी…….
सूरज जागने से पहले
किरण हो जाती
सूरज के सोते ही
दीपक हो जाती थी
उसके बाद घर अपना हो जाता था
मां जगती थी घर सो जाता था
समय चलता रहा
रूप बदलता रहा
पर मां
मां रही नहीं बदली
द्वार भी न बदला
फिर दिन दोहराया
मां ने फिर वैसा ही तोरण सजाया
इसी द्वार से किया
बहू का गृह-प्रवेश
निज का और द्वार का हासिल
निवेश
हर दिन होती दहलीज रोली
हर दिन सजती छोटी रंगोली
दहलीज पर कोई खड़ा न होता
बाहर होता या भीतर होता
द्वार गर्वित रहा
द्वार चर्चित रहा…….
एक दिन सब कुछ वही रहा
पर मां नहीं रही
द्वार ने देखा था
मां को डोली में आते
द्वार ने देखा
मां को कांधे पे जाते
मां ने न देखा द्वार को अश्रू बहाते
मां क्या गयी
कुछ भी पहले सा न रहा
अब द्वार भी वो द्वार न रहा
हो गया लोहे का बड़ा गेट
जिसके साथ
एक चौकस कुत्ता ऊंघता रहता है
खाली सडक को सूंघता रहता है देव परंपरा : मनाली के बाहरी इलाके में 10 गांवों में शोर की इजाजत नहीं, यहां 42 दिनों के लिए साइलेंट मोड पर रहता है मोबाइल फोन


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