अब न ललारी बचे न पंद, लुट गया जमीन पर बैठने का आनंद, विकास की रफ्तार में खो गया पहाड़ की औरतों के हाथों का हुनर

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अब न ललारी बचे न पंद, लुट गया जमीन पर बैठने का आनंद, विकास की रफ्तार में खो गया पहाड़ की औरतों के हाथों का हुनर
सुंदरनगर से पवन चौहान की रिपोर्ट
‘आया हो ललारिआ, तू बोयां हो ललारिआ
बैठणे जो देंदी ओ तिजो पंद, पंद ओ ललारिआ हो।’
बेशक यह अमर लोकगीत अभी तक पहाड़ के लोगों की जुबां पर हो, लेकिन अब न ललारी रहे और न हीं पंद। कभी मेहमानों को आदर सत्कार के साथ बैठने के लिए दिए जाने वाले बिन्ने और मंजरी (पंद) तेजी से गायब हो रहे हैं और इसी के साथ गायब हो रहा है पहाड़ की औरतों के हाथ का हुनर। अब ये चीजें गिने चने गांवों में थोड़े बहुत घरों में ही देखे जा सकते हैं। अब रेडीमेड बैठकू या कुर्सियां ड्राइंग रूम की शोभा बन चुकी हैं तो खाने के लिए डाइनिंग टेबल। पहले पहाड़ की अधिकतर औरतें बिन्ना व मांजरी बुनने का हुनर जानती थीं, लेकिन अब यह हुनर कुछ औरतों तक ही सीमित रह चुका है। बिन्ना व मांजरी बनाने में जिस मेहनत, प्यार, लगन और अपनेपन का अहसास झलकता है, बाजार से खरीदी चीजों में कहां। पहले लड़कियां अपने ससुराल के लिए बिन्ने और मंजरियां पहले लडक़ी की शादी में घर की अन्य चीजों के साथ बिन्ने और मांजरी अवश्य ही दी जाती थी और उन पर कसीदाकरी से लडक़ी के हस्तशिल्प में माहिर होने के हुनर को देखा जा सकता था.
मशीनों से छीना हाथ का हुनर
आधुनिक जीवन शैली बहुत -सी पारंपरिक चीजों को काफी पीछे छोड़ आई है। मशीनीकरण के इस युग ने हर वस्तु को नए अंदाज, नए फैशन और चमक– धमक व सस्ते दाम में पेश करके हाथ से बनी वस्तुओं का वजूद ही मिटाकर रख दिया है। इसी चकाचैंध में दम तोड़ चुका है हमारे हाथों का हुनर दर्शाने वाले पारंपरिक ‘बिन्ने’ (बैठकु) और ‘मांजरी’ (चटाई)। बिन्ने का प्रयोग सिर्फ एक व्यक्ति के बैठने के लिए होता है जबकि मांजरी( जिसे कई जगह ‘पंद’ के नाम से भी जाना जाता है) का प्रयोग एक से अधिक लोग बैठने या फिर सोने के लिए करते है।
मक्की के कोके से बनता बिन्ना
बिन्ना बनाने के लिए मुख्यतया ‘कोके’ (मक्की का बाहरी छिलका) का इस्तेमाल किया जाता है। बिन्ने को बनाने के लिए हल्दी के पत्ते या पराली का इस्तेमाल भी प्रयेाग होता आया है। बिन्ने को आमतौर पर गोल आकार दिया जाता है, लेकिन इसे और आकर्षक और फैशनेबल बनाने के लिए चैरस, तिकोना या अन्य आकार में भी ढाला जाता है। एक बिन्ने को बनाने में लगभग चार से पांच घंटे तक का समय लग जाता है। बिन्ने को सुंदर व आकर्षक बनाने के लिए इसमें लगने वाली सामग्री को अलग- अलग प्रकार के रंगों में रंगकर इस्तेमाल किया जाता है। यदि कोके को रंगना न हो तो इसके बदले रंग बिरंगे प्लास्टिक को कोके के ऊपर लपेटकर इसे तैयार किया जाता है।
पराली, हल्दी के पत्ते तथा खजूर के पत्तों से बन ती मांजरी
मांजरी को बनाने के लिए पराली, हल्दी के पत्ते तथा खजूर के पत्तों (पाठे) का इस्तेमाल किया जाता है। मांजरी लंबी और चैरस होती है। पाठे की मांजरी में पहले पाठे के पत्तों को एक बिशेष तकनीक से आपस में हाथ से बुनकर कम चैड़ी, लेकिन एक मांजरी के आकार के अनुसार बराबर लंबी पट्टी तैयार की जाती है। पराली की मांजरी को समतल जमीन पर चार खूंटियां गाड़ कर और उनमें सेबे या प्लास्टिक की पतली डोरियों को समान दूरी में बांधकर फिर थोड़ी– थोड़ी पराली लेकर सेबे या प्लास्टिक की डोरी से गांठे देकर तैयार किया जाता है। आजकल बनने वाली मांजरियों में महिलाएं रंग– बिरंगे प्लास्टिक के रैपर लगाकर उन्हे एक नए रुप में पेश कर रही हैं। ये मांजरियां लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती हैं। पराली की मांजरी को बनाने में पांच से छ: घंटे तक का समय लग जाता है। पाठे की मांजरी के लिए पहले पाठे की लगभग चार ईंच चैड़ी लेकिन कई मीटर लंबी (माजरी के साइज के अनुसार) पट्टी एक बिशेष तकनीक द्वारा पाठों को आपस में बुनकर तैयार की जाती है। फिर इस पट्टी को मांजरी के आकार के अनुरुप पाठे से ही सी कर जोड़ा जाता है। पाठे की मांजरी बनाने के लिए लगभग एक सप्ताह तक का समय आराम से लग जाता है। पाठे की मांजरी पतली लेकिन पराली की मांजरी मोटी व नरम होती है।
हाथ से बनी चीजों का मुकाबला नहीं
महादेव गांव की सौजी देवी आज भी अपने घर के लिए अपने हाथ से हर साल बिन्ने व मांजरियां तैयार करती है। वह कहती हैं,‘हम चाहे मशीनों से बनी साजो-समान व आराम की कितनी भी चीजें घर में सजा लें, लेकिन अपने हाथों से बनाई गई चीजों का कोई मुकाबला नहीं कर सकता। इन चीजों को बनाने से जहां खाली समय आराम से कट जाता है वहीं अपने हुनर की क्रियाशीलता भी बनी रहती है। इस तरह की चीजों से दूर होने का साफ मतलब यह है कि हम अपनेपन से दूर भाग रहे हैं।
हेल्थ फिटनेस के लिए जरूरी जमीन पर बैठना
पहले जब भी कोई मेहमान घर आता था तो उसे बिन्ने या मांजरी पर बिठाया जाता था, लेकिन बदलते परिवेश में इन चीजों का स्थान धरती से दो फुट ऊंची कुर्सी, बैठकु या फिर अन्य चीजों ने ले लिया है। यदि वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो बिन्ना या मांजरी में बैठकर खाने से या बैठने– उठने से शारीरिक व्यायाम हो जाता है जो स्वास्थ्य की दृष्टि से लाभदायक है। यूं भी धरती पर भोजन करना मेज पर या खड़े होकर भोजन करने से ज्यादा बेहतर माना जाता है। तो आइए चलें, बिन्ने और मांजरी के दौर में एक बार फिर से वापिस ताकि हमारा हुनर जिंदा रह सके, स्वास्थ्य बना रहे और बची रह सकें हमारी पीढिय़ों की यादें।

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