अनपढ़ किंकरी ने लड़ी भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई : हाईकोर्ट के बाहर 19 दिनों तक भूख हड़ताल कर बुलंद की आवाज  सुप्रीम कोर्ट तक लड़ी खनन माफिया के खिलाफ लड़ाई, खानें बंद करवाईं

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फोकस हिमाचल न्यूज नेटवर्क. नाहन

एक अनपढ़ महिला जो जवानी में पति की मौत के बाद संघर्षमयी जीवन जीने को मजबूर थी, खनन माफिया ने जब सिरमौर के पहाड़ों को रौंदना शुरू किया तो दुर्गा बनकर टूट पड़ी। रसूखदार खनन माफिया के खिलाफ जिस समय जनप्रतिनिधि, मीडिया और प्रशासनिक अमला मौन था, एक महिला पराक्रम से शौर्य गाथा लिखने में जुटी थी।प्रेरक – जिस बटालियन में लांस नायक पति हुए थे शहीद, उसी में बेटे को अफसर बनाने वाली वीर नारी को जयहिंद
अनशन के अन्ना हजारे के नाम से परिचित पहाड़ की युवा पीढ़ी को शायद कम पता हो कि कभी किंकरी देवी ने शासन, प्रशासन की मिलीभगत से फलने-फूलने वाले खनन माफिया से टकराने के लिए हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के सामने 19 दिन की हड़ताल की थी। वह खनन माफिया के खिलाफ सड़कों और अदालतों में लड़ीं और दोनों जगह खनन माफिया की चूलें हिलाकर रख दी। यह एक साधारण महिला की शक्ति की असाधारण जीत थी, जिसे दुनिया ने नमन किया और और चीन में आयोजित अंतरराष्ट्रीय महिला कांफ्रेंस में उन्हें सम्मानित किया गया।

न गरीबी डिगा पाई, न डर हिला पाया
गरीब किंकरी देवी के लिए खनन माफिया के खिलाफ लड़ाई एक खतरनाक मोड़ ले चुकी थी। उसकी जान को खतरा था। कई बार धमकियां मिलीं, लेकिन उन्हें न गरीबी डिगा पाई और न ही डर हिला पाया। दृढ़ इच्छा शक्ति, अदम्य साहस व मानसिक रुप से सुदृढ़ किंकरी देवी ने सिरमौर जिले में खनन माफियाओं के खिलाफ ऐसी जंग लड़ी, जिसकी गूंज सात समंदर पार तक सुनाई दी। उसकी जीवटता के आगे खनन माफिया को हार मानने को मजबूर हुआ। किंकरी देवी ने सुप्रीम कोर्ट तक खनन माफिया के खिलाफ संघर्ष किया।  प्रेरककथा – कैदी उसे ‘मां’ कहते थे, जेलों में करवाया कई नाटकों का मंचन, कैदियों के जज्बातों को पुस्तकों के रूप में दी आवाज, कैदियों का जीवन बदलने वाली अमर कहानीकार, अनुवादक, समीक्षक, उद्घोषिका एवं समाजसेवी सरोज वशिष्ट
चीन में दिखाई चमक
किंकरी देवी के साहस की गवाह इस लड़ाई के लिए केंद्र सरकार ने वर्ष 2001 में किंकरी देवी को पर्यावरण के क्षेत्र में ‘रानी झासी स्त्री शक्तिÓ राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजा। वर्ष 1995 में किंकरी देवी को चीन की राजधानी बीजिंग में होने वाली इंटरनेशनल वूमेन कांफ्रेंस में बुलावा आया। उस समय किंकरी देवी की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि वह इस समारोह में भाग ले पाती। तब एक गैर सरकारी संगठन ने उन्हें चीन भेजने का खर्चा उठाया।  प्रदेश की महिला शक्ति के लिए वह ऐतिहासिक क्षण था, जब अमेरिका की प्रथम महिला और कांफ्रेंस की मुख्य अतिथि हिलेरी क्लिंटन ने किंकरी देवी के हाथों दीप प्रज्जवलित करवा कर कांफ्रेंस का शुभारंभ करवाया।

किंकरी देवी : नारी शक्ति की अनूठी मिशाल
संगड़ाह तहसील के घाटों गांव के किसान कलिया राम के घर में 4 जुलाई 1925 को जन्मी किंकरी देवी 13 साल की ही थी कि संगड़ाह के श्याम सिंह के साथ उनकी शादी कर दी गई थी। 22 वर्ष की आयु में उनके पति का बुखार से आकस्मिक निधन हो गया। इसके बाद किंकरी देवी का जीवन बेहद ही संघर्षमय हो गया। बेशक किंकरी की स्कूली पढ़ाई नहीं हुई थी, लेकिन उन्हें इस बात का ज्ञान था कि महिलाओं, असहायों और कमजोर वर्गों को शोषण से बचाने के लिए एकजुटता और संघर्ष जरूरी है। वर्ष 1970 में वह संगड़ाह महिला मंडल की प्रधान बनीं और यहीं से उनके संघर्ष को दिशा मिलनी शुरू हो गई। वह अत्याचार के खिलाफ हमेशा अपनी आवाज मुखर करती रहीं। नारी शक्ति की अनूठी मिशाल कायम करने वाली किंकरी देवी ३० दिसंबर, 2007 को इस दुनिया से रूखसत हो गई।शिक्षिका की सोच का कमाल, लोक संस्कृति की संभाल : संगीत शिक्षिका ललिता बांगिया ने मंडी की लोक संस्कृति के प्रचार-प्रसार में निभाई अहम भूमिका

किंकरी के संघर्ष का सिलसिला
यह अस्सी के दशक का वह दौर था, जब आर्थिक तौर पर पिछड़े सिरमौर जिले की शांत पहाडिय़ों को खोद कर पूंजीपति रातोंरात दौलत कमाने के लिए आ धमके और यहां अंधाधुंध अवैध खनन शुरू हो गया। पहाड़ों और वनस्पति को नष्ट होते देख किंकरी देवी ने खान माफिया के खिलाफ टकराने का निर्णय लिया। घर में पसरी गरीबी के बावजूद ताकत, पहुंच और रसूख वाले खनन माफिया से टकराव कतई आसान नहीं था। वह जानती थी कि अगर लड़ाई नहीं लड़ी गई तो यहां का पर्यावरण तबाह हो जाएगा। किंकरी ने अभियान शुरू किया जो एक गैर सरकारी संगठन ‘पीपुल एक्शन फार पीपुल्स नीडÓ किंकरी के साथ लड़ाई में उतर आया। हालांकि 1982 में छेड़ा गया यह अभियान नेताओं व नौकरशाहों की खनन माफि याओं से मिलीभगत के कारण दम तोड़ गया, पर किंकरी देवी ने हार नहीं मानी।  एक अध्यापिका का मुश्किल भरा रहा 15 वीं राष्ट्रपति बनने तक का सफ़र, द्रौपदी मुर्मू सर्वोच्च पद पर पहुंचने वाली देश की पहली आदिवासी और दूसरी महिला, जानिये एक अध्यापिका का राजनीति से यहां तक सफ़र

शिमला-दिल्ली तक लड़ी सिरमौर की लड़ाई  
किंकरी देवी ने गैर सरकारी  संस्था के साथ मिलकर 1987 में प्रदेश हाईकोर्ट में सिरमौर की चूना पत्थर खानों में खनन के खिलाफ जनहित याचिका दायर की। कई साल इस मामले पर फैसला न होने से दुखी किंकरी देवी ने अनशन का सहारा लिया और हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के बाहर 19 दिनों तक लगातार भूख हड़ताल की। 31 दिसंबर, 1991 में हाईकोर्ट ने संगड़ाह, बनौर व कमरऊ में 48 चूना पत्थर खानों में ब्लास्टिंग पर रोक लगा दी। खनन माफियाओं के खिलाफ यह एक बड़ी जीत थी, लेकिन किंकरी देवी का संघर्ष अभी यहां खत्म नहीं हुआ। खनन लॉबी ने हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की। जुलाई 1995 में सुप्रीम कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया। किंकरी देवी का संघर्ष सफल हुआ और वह इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया।  वरिष्ठ साहित्यकार चन्द्ररेखा डढवाल  की कहानी की समीक्षा : ‘वक्त तो लगेगा’ भारतीय नारी के संस्कारों के चित्रण की यर्थाथवादी कहानी  


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