अजब – गजब – मन साफ़ तो एक उंगली से हिल जाता है पांडु पत्थर, मन में पाप तो दस लोग मिल कर नहीं उठा पाते, माता मृकुला के मंदिर परिसर में स्थित पत्थर धर्म के मार्ग पर चलने वालों की परीक्षा

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अजब – गजब – मन साफ़ तो एक उंगली से हिल जाता है पांडु पत्थर, मन में पाप तो दस लोग मिल कर नहीं उठा पाते, माता मृकुला के मंदिर परिसर में स्थित पत्थर धर्म के मार्ग पर चलने वालों की परीक्षा
उदयपुर से विनोद भावुक की रिपोर्ट
लाहौल स्पीति के उदयपुर में माता मृकुला का मंदिर के प्रांगन में एक ऐसा पत्थर मौजूद है, जिसे एक उंगली से हिलाया जा सकता है, लेकिन अगर मन में पाप की भावना हो तो 10 लोग मिलकर भी उस पत्थर को नहीं हिला सकते। इस पत्थर को स्थानीय लोग पांडू पत्थर के नाम से जानते हैं। मान्यता है कि माता मृकुला के दरबार में रखा यह पत्थर धर्म के मार्ग पर चलने वालों की परीक्षा लेता है। भीम द्वारा रखा गया यह ऐतिहासिक पत्थर श्रद्धापूर्वक मां मृकुला का जयकारा लगाने पर यह पत्थर सीधे हाथ की एक अंगुली से उठ जाता है।
पत्थर के वजन के बराबर मिलता था भीम को भोज
मान्यता है कि पांडु पुत्र भीम जब अज्ञातवास में लाहौल के उदयपुर में आए तो उन्होंने इस पत्थर को मंदिर के प्रांगण में रखा। भीम इस पत्थर के वजन के बराबर एक समय में भोजन ग्रहण करते थे। अज्ञातवास के दौरान माता कुंती जब पांडवों के लिए भोजन पकाती थी तो भीम अपने भाइयों के हिस्से का सारा भोजन खा जाते थे। तब माता कुंती इस पत्थर के भार के बराबर भोजन भीम को देती थीं।
एक पेड़ की लकड़ी से बना मंदिर
किंवदंती के अनुसार माता मृकुला देवी का मंदिर पांडवों के वनवास के समय महाबली भीम द्वारा लाए गए एक वृक्ष की लकड़ी से बनाया गया है। कहा जाता है कि एक दिन में ही इस मंदिर का निर्माण हुआ। माता मृकुला देवी को माता काली महिषासुरमर्दिनी के रूप में पूजा जाता है।
फागली के दौरान साल में एक बार निकलता है खप्पर
बताया जाता है कि जब महिषासुर का वध करके जिस खप्पर में महिषासुर का रक्त भरा था वह खप्पर आज भी माता काली की मूर्ति के पीछे रखा गया है। जिसे श्रद्धालुओं का देखना पूर्णतया निषेध है व इस खप्पर को साल में केवल एक बार लाहौल-स्पीति के विख्यात लोक उत्सव फागली के दौरान मंदिर से आरती करते हुए पुजारी अपने निवास स्थान को ले जाते हैं।
चंबा के राजा ने बनवाया मंदिर
ऐसा माना जाता है कि जो इस खप्पर को गलती से देख ले वह अंधा हो जाता है। जिसके डर से आज तक कोई भी इसे देखने का साहस नही करता है। 8वीं सदी में मां काली की स्थापना के बाद 16वीं शताब्दी में चंबा के राजा उधम सिंह लाहौल आए। उस दौरान उन्होंने उदयपुर में माता मृकुला देवी की मूर्ति की स्थापना की। कहा जाता है कि पहले इस जगह का नाम मरगुल था, लेकिन चंबा के राजा उधम सिंह के आगमन के बाद इस जगह का नाम उदयपुर पड़ा।

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