अंग्रेजों के हाथों गोरखा सेना की हार का गवाह सिरमौर का जैतक किला, किले से जुड़े हैं कई ऐतिहासिक प्रसंग

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अंग्रेजों के हाथों गोरखा सेना की हार का गवाह सिरमौर का जैतक किला, किले से जुड़े हैं कई ऐतिहासिक प्रसंग
चंडीगढ़ से वीरेंद्र शर्मा ‘वीर’ की रिपोर्ट
सिरमौर का जैतक किला अंग्रेजों के हाथों गोरखा सेना ही हार का गवाह है। यह किला इतिहास के कई प्रसंगों को समेटे हुए है। 19 दिसंबर 1814 को ब्रिटिश सेना सिरमौर की राजधानी नाहन पहुंची। ब्रिटिश सेना के नाहन पहुंचने से पहले ही रणजोर थापा अमले सहित जैतक किले की ओर भाग गया। ब्रिटिश सेना ने 25 दिसंबर 1814 को मेजर जनरल मार्टीनडेल की अगुवाई में जैतक किले पर हमला किया, किंतु सफलता नहीं मिली। इस लड़ाई में सिरमौर रियासत और ब्रिटिश सेना को भारी क्षति हुई। लगभग 1600 सैनिकों ने जाने गंवाई। ब्रिटिश सेना ने एक महीने तक किले को घेरे रखा। किले तक पहुंचने वाली रसद को रोक दिया गया। इसी दौरान कुमाऊं और नालागढ़ में गोरखा सेना को हार का मुंह देखना पड़ा। इसी बीच पूरे इलाके में भयंकर ओलावृष्टि ने भी गोरखा सेना की कमर तोड़ दी। पांच तक चली लड़ाई में प्रतिकूल स्थितियों के चलते गोरखा सेना को 21 मई 1815 को किला खाली करना पड़ा।
जमटा नामक स्थान पर स्थित किला
जैतक किला सिरमौर जिला मुख्यालय नाहन से करीब 19 किलोमीटर दूर रेणुका जी की ओर सडक़ मार्ग पर धारटीधार निम्न पहाड़ी श्रृंखला पर जमटा नामक स्थान के पास सुरम्य घाटी में चीड़ के वनों से घिरा समुद्र तल से लगभग 1479 मीटर की ऊंचाई पर स्थित एक ऐतिहासिक किला है। हरियाली से भरपूर नज़ारों के बीच अवस्थित ये ऐतिहासिक किला पुरातन काल में अपनी सामरिक दृष्टि के कारण तो महत्वपूर्ण रहा है। हालांकि अब मूल किले के अवशेष मात्र ही नजऱ आते हैं, फिर भी नाहन राजपरिवार से संबंधित कंवर अजय बहादुर सिंह ने एक हवेली का निर्माण कर यहां पर दूर से आने वाले यात्रियों के लिए कुछ पल ठहरने की व्यवस्था की है।
साल भर पर्यटकों का आगमन
बेशक बिना आज्ञा वहां प्रवेश की मनाही है, फिर भी वर्ष भर यात्रियों की आवाजाही बनी रहती है। इस किले जैतक किले में वर्षा जल संग्रहण कर उसके शुद्धिकरण कर पीने योग्य बनाने तक की व्यवस्था थी । लगभग नष्ट हो चुके इस किले में भगवान गणेश , शिव की पूजा किए जाने के सबूत मिलते हैं। किले के अंदर महल का रखरखाव अच्छी तरह से हुआ है।‌ संरक्षक कंवर अजय बहादुर सिंह ने यहां एक छोटे से संग्रहालय का निर्माण भी किया है।
किले की ओर जाने वाला हर रास्ता कमाल
सडक़ मार्ग से यहां पहुंचने के लिए शिमला कुमारहट्टी नाहन मार्ग पर दोसडक़ा नामक स्थान से जामटा- ददाहु मार्ग होकर पहुंचा जा सकता है । किले के पास ही एक हैलीपैड का भी निर्माण किया गया है। जैतक किला दिखने में बेहद आकर्षक है और यह हमारे पुरातन समृद्ध समय की याद दिलाता है। इस किले के लिए खुद ड्राइव करके जाना सबसे अच्छा तरीका है, क्योंकि इसकी ओर जाने वाला रास्ता प्रत्येक ओर से कई प्राकृतिक दृश्यों से भरपूर है। जामटा से कुछ दूर सडक़ मार्ग छोड़ किले तक पहुंचने के लिए पर्यटक करीब तीन किलोमीटर तक पहाड़ी मार्ग का प्रयोग भी कर सकते हैं।
रणजोर सिंह थापा ने करवाया निर्माण
ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण जैतक किले के निर्माण को लेकर इतिहासकार एकमत नहीं हैं। गिरी नदी के आर-पार के बाह्या हिमालयी क्षेत्रों चूड़धार से लेकर शिवालिक पहाड़ी श्रृंखला के तहत‌ सैणधार , धारटीधार, नैहणधार की पहाडिय़ों के मध्य अवस्थित समूचे सिरमौर के लगभग हर दूसरे गांव में कनैत जाति क्षत्रिय राजपूतों का निवास है। एक मत है कि शायद कनैतों के प्रसिद्ध जैताक वंश के नाम के आधार पर इस गांव /किले को जैतक का नाम मिला हो। दूसरा मत यह है कि चंद्रगुप्त मौर्य ने मगध के नन्द वंश को समाप्त करने में उन पर हमला किया तो वहां का राजा सामना नहीं कर पाया और जिसने नाहन से जैतक किले के अंदर छिप कर शरण ली थी। माना ऐसा भी जाता है कि सैण धार व धारटीधार पहाडिय़ों में मध्य स्थित इस किले का निर्माण पहले अंग्रेज- नेपाल युद्ध (गोरखा युद्ध) में नष्ट हुए नाहन किले से बरामद सामग्री का उपयोग करके सन 1810 में गोरखा नेता रणजोर सिंह थापा द्वारा किया गया।
बिलासपुर पर कांगड़ा राजा की चढ़ाई, सिरमौर के राजा को वीरगति
नेपाल का राजवंश अपने राज्य की सबसे सीमाओं में विस्तार की इच्छा से अमर सिंह थापा की अगुवाई में भारत के गढ़वाल क्षेत्र तक बढ़ आया था। इसी काल में कांगड़ा के राजा महाराज संसार चंद ने बिलासपुर रियासत पर चढ़ाई कर दी। बिलासपुर के राजा ने सिरमौर के राजा से सहायता का आग्रह किया। इस आग्रह को स्वीकार करते हुए राजा जगत प्रकाश ने स्वयं अपनी सेना का नेतृत्व करते हुए महाराजा संसार चंद के विरूद्ध भयंकर युद्ध लड़ा और इस युद्ध में राजा धर्म प्रकाश वीरगति को प्राप्त हुए। उनकी मृत्यु के उपरांत उनके भाई राजा कर्म प्रकाश ने सिरमौर की गद्दी हासिल की। वह एक उदासीन शासक था फलस्वरूप शीध्र ही राजमहल में षडयंत्रों के चलते उसने समस्त जनपदों का सहयोग गंवा दिया। कुछ षडय़ंत्रकारियों ने तो राजा कर्म प्रकाश के भाई रत्न प्रकाश के साथ मिलकर सिरमौर की गददी को हथियाने का प्रयास किया। राजा कर्म प्रकाश ने षडय़ंत्रों पर विजय की कामना लेकर नेपाल से भारत पहुंचे गोरखा सेना प्रमुख काजी रणजोर थापा से सहायता की गुहार लगाई।
रत्न प्रकाश को प्रतीकात्मक गद्दी
कमांडर अमर सिंह थापा तो ताक में ही था उसने इस अवसर का लाभ उठाया और अपने पुत्र कमांडर रणजोर थापा को भेजा, जिसने राजमहल को षडयंत्र से मुक्त करवाया। गोरखा कमांडर ने प्रतीकात्मक रूप से रत्न प्रकाश को ही गद्दी पर बिठा दिया और कर्म प्रकाश को उनकी गददी वापिस नहीं लौटाई। इसके बाद भी कमांडर रणजोर थापा अपनी गोरखा सेना के साथ नाहन में ही डटा रहा। राजा कर्म प्रकाश इस निर्णय से अत्याधिक आहत हुआ और उन्होंने रामगढ़ रियासत के अधीन सुबाथु में शरण ली। रामगढ़ नरेश कुशाल सिंह की मृत्यु के उपरांत उनके पुत्र ने कर्म प्रकाश को रियासत छोडऩे का आदेश दिया और वे बूडिय़ा चला गया जहां रहते हुए सन 1826 में मृत्यु हुई।
रानी ने मांगी अंगे्रजों से मदद
हालात बिगड़ते देख राजा कर्म प्रकाश की धर्मपत्नी रानी गुलेर ने लुधियाना अवस्थित ब्रिटिश कमांडर कर्नल आक्टरलोनी से सहायता की गुहार लगाई और सिरमौर की रियासत को गोरखों से मुक्तकरने का आग्रह किया। इस आग्रह के बाद ब्रिटिश सरकार ने गोरखों के विरूद्ध औपचारिक रूप से युद्ध का ऐलान कर दिया। लुधियाना से मार्च कर ब्रिटिश सैनिकों ने देहरादून के कलिंगर से गोरखा सैनिकों को खदेड़ा। इसके पश्चात मेजर रीलो गलेस्पी की अगुवाई में ब्रिटिश सेना की टुकड़ी देहरादून और क्यारदादून की ओर बढ़ी, तो गोरखा कंमांडर बलभदिर थापा ने भागकर कालंगा किले में शरण ली।
गोरखा सेना को खाली करना पड़ा किला
19 दिसंबर 1814 को ब्रिटिश सेना देहरादून से सिरमौर की राजधानी नाहन पहुंची। रणजोर थापा ब्रिटिश सेना के नाहन पहुंचने से पहले ही अमले सहित जैतक किले की ओर भाग गया। ब्रिटिश सेना ने 25 दिसंबर 1814 को मेजर जनरल मार्टीनडेल की अगुवाई में हमला किया, किंतु सफलता नहीं मिली। गोरखा सैनिकों के अदम्य साहस और गुरिल्ला युद्ध के कारण सिरमौर रियासत और ब्रिटिश सेना को भी जान और माल की भारी क्षति हुई और दोनों ओर के लगभग 1600 सैनिकों ने जाने गंवाई। ब्रिटिश सेना ने एक महीने तक किले को घेरे रखा। किले तक पहुंचने वाली रसद को रोक दिया गया। दिन- प्रतिदिन जंग चलती रही। इसी दौरान कुमाऊं और नालागढ़ में गोरखा सेना को हार का मुंह देखना पड़ा । इसी बीच पूरे इलाके में भयंकर ओलावृष्टि ने भी गोरखा सेना की कमर तोड़ दी। 21 मई 1815 के बीच पांच मास तक ये लड़ाई लड़ी गई, किन्तु प्रतिकूल स्थितियों के चलते गोरखा सेना को किला खाली करना पड़ा।
फिर से सिरमौर रियासत को मिला किला
रायल नेपाल सरकार और ब्रिटिश इंडिया गवर्मेंट के बीच हुए समझौते के बाद जैतक किला पुन: सिरमौर रियासत के कब्ज़े में आ गया । ब्रिटिश सरकार ने सिरमौर रियासत के गोरखों से मुक्तहोने के बावजूद राजा कर्म प्रकाश के अवस्यक पुत्र फतेह प्रकाश को सनद प्रदान की और राजकुमार की माता को उनके व्यस्क होने तक राजकुमार का संरक्षक नियुक्त किया। 1827 में फतेह प्रकाश के व्यस्क होने के उपरांत ब्रिटिश सरकार ने उन्हें राज्य के सारे अधिकार लौटा दिए।

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