अंग्रेजी की प्रोफेसर की हिंदी साहित्य लेखन में ऊंची उड़ान, रेखा वशिष्ठ के काव्य व कहानी संग्रह को मिले अकादमी पुरस्कार

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अंग्रेजी की प्रोफेसर की हिंदी साहित्य लेखन में ऊंची उड़ान, रेखा वशिष्ठ के काव्य व कहानी संग्रह को मिले अकादमी पुरस्कार
मंडी से विनोद भावुक की रिपोर्ट
मंडी शहर से सम्बन्ध रखने वाली वरिष्ठ हिंदी साहित्यकार रेखा वशिष्ठ ने बेशक थोड़ा लिखा है, लेकिन बेमिसाल लिखा है। यह भी कमाल ही है कि तीन दशक तक प्रदेश के विभिन्न कॉलेजों में अंग्रेजी साहित्य एवं भाषा पढ़ाने वाली रेखा वशिष्ठ ने साहित्य लेखन के लिए अंग्रेजी की जगह हिंदी को चुना। उनके तीन हिंदी काव्य संग्रह ‘अपने हिस्से की धूप’ (1984), ‘चिंदी चिंदी सुख’ (1987) व ‘विरासत जैसा कुछ’(2012) में प्रकाशित हुए हैं। कहानी संग्रह ‘पियानो’ (1994) में प्रकाशित हुआ। कई प्रतिनिधि संकलनों में उनकी कविताएं व कहानियां प्रकाशित हुई हैं और अकाशवाणी व दूरदर्शन पर उनकी रचनाओं के पाठ हुए हैं।
काम को मिले सम्मान
रेखा वशिष्ठ को वर्ष 1986 में उनके कविता संग्रह ‘अपने हिस्से की धूप’ के लिए हिमाचल प्रदेश भाषा, कला एवं संस्कृति अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उन्हें हिंदी साहित्य में योगदान के लिए चंद्रधर शर्मा गुलेरी शिखर सम्मान भी प्राप्त हुआ है। साल 1984 में कहानी संग्रह ‘पियानो’ के लिए हिमाचल प्रदेश भाषा, कला एवं संस्कृति अकादमी पुरस्कार और ‘हाथ’ कहानी के लिए कथा पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।
कॉलेज प्रिंसीपल के पद से सेवानिवृत
22 जनवरी 1951 को मंडी में पैदा हुई रेखा की मैट्रिक तक की पढ़ाई सरकारी स्कूल द्रंग से हुई। उन्होंने वल्लभ कॉलेज मंडी से स्नातक करने के बाद पंजाब विश्वविद्यालय चंडीगढ़ से अंग्रेजी में स्नातकोत्तर किया और हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिमला से एमफिल व पीएचडी की। उन्होंने लभगभ 31 सालों तक शिमला सहित प्रदेश के विभिन्न महाविद्यालयों में अंग्रेजी साहित्य एवं भाषा का अध्यापन करने के बाद दो साल राजकीय महाविद्यालय घुमारवीं में प्राचार्य के तौर पर सेवाएं प्रदान कीं और वहीं से वर्ष 2008 में सेवानिवृत हुईं।
शिमला से मिली लेखन को गति
रेखा वशिष्ठ का कहना है कि हिंदी हमेशा उनके दिल के करीब रही है, इसी कारण अंग्रेजी में अध्यापन के बावजूद उन्होंने हिंदी में लेखन कार्य किया। वे कहती हैं कि स्कूल के दिनों से ही पढऩे के प्रति दिवानगी थी, खासकर हिंदी साहित्य के लिए। कॉलेज की स्टूडेंट्स मैगजीन में लिखा, लेकिन 1984 में जब शिमला पहुंची तो लेखन को लेकर गंभीरता आई। पहले कविता की ओर आकर्षण पैदा हुआ और फिर कहानी की तरफ मुडऩा हुआ। रेखा वशिष्ठ ने दोनों विधाओं में अपनी गहरी छाप छोड़ी है।
साहित्यिक आयोजनों में मजबूत उपस्थिति
रेखा के पति प्रोफेसर बलवंत भी अंग्रेजी के प्राध्यापक रहे हैं और उनकी संस्कृत पर भी गहरी पकड़ है। उनकी दो बेटियां कमायनी व कुनप्रिया हैं। उच्च शिक्षा हासिल करने के बाद दोनों बेटियों की शादियां हो चुकी हैं। रेखा वशिष्ठ ने सेवानिवृति के बाद स्वतंत्र लेखन शुरू किया। रेखा वशिष्ठ साहित्यिक आयोजनों में जहां अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करवाती हैं, वहीं युवा साहित्यकारों को लेखन के प्रति प्रोत्साहित करने में भी हमेशा आगे रहती हैं।

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