संगीत जन्म से था हेंडीकैप, पहनी टीम इंडिया की कैप 

मंडी की उत्तरशाल घाटी के रूंज गांव के दिव्यांग संगीत चौहान ने विपरीत परिस्थितियों में पेश की संघर्ष की मिसाल 

मंडी से विनोद भावुक की रिपोर्ट 

मंडी जिला के द्रंग विधानसभा क्षेत्र की उत्तरशाल घाटी के रूंज गांव के इंजीनियर नानक चंद एव गहणी मां आशा देवी के घर जब 24 मार्च 1991 को पहली ही संतान के रूप में दिव्यांग बच्चे  संगीत का जन्म हुआ तो किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि एक दिन यही बच्चा अपनी आसाधरण खेल प्रतिभा के बलबूते देश में अपनी खास पहचान बनाएगा। 

सात साल की उम्र, गांव से शुरू हुआ किक्रेट का सफर 

संगीत चौहान ने सन 1998 में सात साल की उम्र में क्रिकेट खेलना शुरू किया। हालांकि एक दिव्यांग ब"ो के लिए क्रिकेट जैसे खेल में खुद को साबित करना एक बड़ी चुनौती थी, लेकिन संगीत में एक आग थी, एक गुस्सा था, जो उसे हमेशा कड़ी मेहनत करने के लिए प्रेरित करता रहा। मुश्किलें उसे और मजबूत करती गईं और वह निखरता गया।

सुंदरनगर से होकर निकला बड़ी कामयाबी का रास्ता 

Sangeet Chauahanसंगीत चौहान पहली बार सन 2005 में तब सुर्खियों में आया, जब हिमाचल प्रदेश रा’य टेनिस बॉल क्रिकेट एसोशिएशन की ओर से सुंदरनगर में आयोजित टूर्नामेंट में खेलने का अवसर मिला। उनकी प्रतिभा को चंडीगढ़ के कोच ओम प्रकाश और सुदरनगर के कोच रविकांत जम्वाल ने पहचाना और उन्हें आगे बढऩे के लिए प्रेरित किया। अगले ही साल युनाइटेड क्लब चंडीगढ़ की ओर से खेलने का अवसर मिला।

अंडर 16 खेलने वाले प्रदेश के पहले दिव्यांग खिलाड़ी 

संगीत चौहान के हिमाचल प्रदेश के  पहले दिव्यांग क्रिकेटर हैं जो जिला स्तर पर समान्य टीम में खेले हैं। सन 2008 में एचपीसीए की ओर से आयोजित अंडर 16 इंटर डिस्ट्रिक के लिए वे लाहौल स्पीति टीम से चुने गए और ऊना के साथ अपना पहला मैच खेला। यहीं से टीम के अतिरिक्त खिलाड़ी और लास्ट डाऊन पर बल्लेबाजी करने उतरने वाले संगीत को ओपनर बेट्समैन व ऑल रांउडर के तौर पर स्थापित होने का अवसर मिला। हिमाचल प्रदेश में शारीरिक अक्षम क्रिकेट टीम बनाने का श्रेय भी उन्हीं को जाता है। उन्होंने उन्होंने अन्य खेलों में भी शारीरिक अक्षम खिलाडिय़ों को खोजने में अहम भूमिका अदा की है। 

संगीत  अपनी  मां ,छोटे  भाई और  बहन के  साथ

संगीत  अपनी  मां ,छोटे  भाई और  बहन के  साथ​

भोपाल के रणजी प्लेयर की  पारखी नजर में आई प्रतिभा

मार्च 2010 में जब वह दिल्ली में नेट प्रेक्टिस कर रहे थे तो भोपाल के रणजी खिलाड़ी चमन लाल उनके खेल से इतने प्रभावित हुए और उन्हें ओल्ड युनाइडेट क्रिकेट क्लब से खेलने का ऑफर दिया। संगीत चौहान नियमित इस क्लब के लिए खेलते आ रहे हैं।  सन 2010 में अचानक संगीत के पिता का देहांत हो गया। परिवार में सबसे बड़ा बेटा होने के चलते संगीत पर क्रिकेट छोडऩे का दबाव आ गया, तब मां ने संबल दिया।  

फरिशता बन आए मनाली को होटलियर अमन वर्मा

मनाली के होटलियर एवं क्रिकेटर अमन वर्मा ने मानसिक और आर्थिक तौर पर संगीत की हर संभव मदद की। यह अमन की मदद का कमाल था कि सन 2012 में संगीत का चयन पहली बार टीम इंडिया के लिए हुआ।  उन्हें पाकिस्तान के साथ होने वाली सीरिज के लिए संगीत को भारतीय शारीरिक अक्षम क्रिकेट टीम में चुना गया। संगीत का कहना है कि आज वह जहां भी है,  जिस भी मुकाम है, उसमें उसकी मेहनत के अलावा कई लोगों की मदद शामिल है। उनका कहना है कि वे हमेशा उन तमाम मददगारों के ऋणी रहेंगे, जिन्होंने उन्हें उनके बचपन के सपने को पंख लगाने में हर संभव मदद   की है। 

 

सबसे पहले पाकिस्तान के खिलाफ पहनी टीम इंडिया की कैप 

 पाकिस्तान के खिलाफ इंडिया कैप  पहचचने वाले संगीत सन 201& में एशिया कप में टीम इंडिया का हिस्सा रहे संगीत भारत, पाक- अफगानिस्तान की ट्राई सीरिज टीम इंडिया की ओर से खेले। वे काठमांडू में आयोजित भारत नेपाल सीरिज में भी टीम इंडिया का हिस्सा थे। सन 2014 में वे कंधे में आई चोट के चलते साऊथ अफ्रीका टूअर नहीं कर सके। सन 2015 में एशियन चैंपियनशिप में भाग लेकर एक बार फिर ख्ुाद को साबित किया। इस साल15 अक्टूबर से 20 अक्टूबर के बीच होने वाले जोनल टूर्नामेंट के संगीत नॉर्थ जोन टीम का हिस्सा हैं। 

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अरूणिमा से मिला संगीत को जीवन का मकसद 

आर्टिफिशियल पांव के बलबूते दुनिया की सबसे ऊंची चोटी मांउट एवरेस्ट को फतेह कर अपने साहस का लोहा मनवाने वाली नेशनल स्तर की वालीबॉल खिलाड़ी अरूणिमा सिन्हा शहीद चंदशेखर अजाद विकलांग खेल अकादमी एवं स्पोर्टस युनिवर्सिटी फॉर हैंडीकैप्ड की स्थापना कर रही हैं। संंगीत इस संस्था से जुड़े हुए हैं। उनका कहना है कि अकादमी पैरा ओलंपिक के लिए प्लेयर तैयार करेगी। वह कहते हैं कि अरूणिमा से उनके जीवन को नया मकसद दिया है। 

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सॉल्ट वैली फांउडेशन तराशेगी ग्रामीण प्रतिभाएं 

हिमाचल प्रदेश की शारीरिक अक्षम क्रिकेट टीम जब भी प्रदेश से बाहर टूर्नामेंट खेलने जाती है तो टीम के आने- जाने व ठहरने के खर्च की व्यवस्था संगीत चौहान करते हैं। संगीत के पिता का सपना था कि ग्रामीण प्रतिभाओं को आगे लाने के लिए उनकी आर्थिक मदद बेहद जरूरी है। संगीत का कहना है कि अपने दिवंगत पिता के अरमानों को पूरा करने के लिए वे सॉल्ट वैली फाउंडेशन की स्थापना कर रहे हैं। फोकस हिमाचल के साथ संवाद में उन्होंने बताया कि जब तक उनके जीवित थे, हर बार एक ही बात समझाते थे कि मेहनत करो, कभी न कभी किसी न किसी की नजर जरूर पड़ती है। संगीत का कहना है कि यही गुर वे युवा प्रतिभाओं को देते हैं। 

भावुक का चाबुक 

‘संगीत’ की मधुर धुन कभी सुनेंगे ‘अनुराग’ 

Anurag Thakurहिमाचल के लिए यह गौरव की बात है कि देश में क्रिकेट को संचालित और नियंत्रित करने वाली और दुनिया की सबसे अमीर संस्था बीसीसीआई के सर्वो"ा पद पर हिमाचल प्रदेश के होनहार युवा अनुराग ठाकुर काबिज हैं। इस बात में भी कोई शक नहीं है कि पहाड़ पर क्रिकेट के प्रति तभी दीवानगी पैदा हुई जब अनुराग ठाकुर के हाथ एचपीसीए की कमान आई। धर्मशाला में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट  ग्रांउड का निर्माण और वहां पर आईपीएल और इंटरनेशनल क्रिकेट मैचों के आयोजन को अनुराग ठाकुर की व्यक्तिगत उपलब्धि के तौर पर प्रचारित करने में भी कोई हिचक नहीं। यहां दूसरा पहलू यह भी है कि बीसीसीआई के अध्यक्ष को अपने प्रदेश में क्रिकेट को लेकर जांच की आंच से गुजरना पड़ रहा है। एचपीसीए और प्रदेश सरकार के टकराव के बीच यह भी कड़वा सच है कि प्रदेश में शरीरिक रूप से अक्षम क्रिकेट टीम के लिए न तो कभी एचपीसीए की ओर से मदद को हाथ बढ़ाए गए और न ही प्रदेश सरकार ही इस बारे में संवेदनशील दिखी। बावजूद इसके संगीत चौहान  जैसे युवा शरीरिक अक्षम खिलाड़ी ने अपनी प्रतिभा के दम पर तमाम संघर्ष के बावजूद इंडिया टीम की कैप पहन कर दिखा दी। सामायिक सवाल है कि विपरीत परिस्थितियों में क्रिकेट के उत्थान की गौरव गाथा लिखने वाले ‘संगीत’ जैसे खिलाड़ी निखारने में एचपीसीए मदद करेगी?

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