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कांगड़ा की फतेहपुर तहसील के बटलाहड़ गांव के विनोद कुमार मंगलोत्रा मलेशिया की नामी होटल चेन के कीचन चीफ बन दिखा रहे हुनर 

फतेहपुर से सुखदेव सिंह की रिपोर्ट 

कांगड़ा जिला की फतेहपुर  तहसील के बटलाहड़ (बरोट) गांव के विनोद कुमार मंगलोत्रा मलेशिया की नामी होटल चेन में बतौर कीचन चीफ बनकर अपनी काबलियत का जादू बिखेर रहे हंै। उनकी काबलियत पर कंपनी प्रबंधकों को इस कद्र भरोसा है कि कंपनी ने उन्हें भारत के केरल राज्य के कोचीन में अपने नए पंजाबी रेस्टोरेंट खोले जाने की भी कमान सौंपी गई। अपनी टीम के साथ विनोद ने कोचीन में नए रेस्टोरेंट को फेवरिट फूड डेस्टिनेशन बना अपनी प्रतिभा दिखाई। दक्षिणी भारत में पंजाबी डिस अमृतसरी कुलचा की दीवानगी पैदा कर विनोद कुमार ने अपने हाथ के हुनर का लोहा मनवा दिया। 

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स्कूल में पढ़ते हुएदेखा था होटल लाईन का सपना 

विनोद कुमार का जन्म 25 मई 1984 को कश्मीर सिंह के घर हुआ था। बचपन से ही वह बहुत होशियार छात्र था। विनोद कुमार ने दसवीं की परीक्षा शहीद बाबा सिंह पब्लिक हाई स्कूल बरोट, सीनियर सकेंडरी तक की पढ़ाई रेहन स्कूल से की। विनोद कुमार ने पढ़ाई के दौरान ही होटल लाइन को अपना कॅरियर बनाने का सपना संजो लिया था।

रूम सर्विस ट्रेनर से किचन चीफ बनने की सफल कथा

अपने कैरियर के शुरूआती दौर में विनोद कुमार फोर स्टार  इंटरनेशनल होटल अमृतसर और होटल ग्रांड में रूम सर्विस ट्रेनिंग कप्तान रहा। कुछ साल होटल लाइन में काम करने के बाद किचन लाइन में जाने का उसके मन में ख्याल आया। सन 2008 में फोर स्टार होटल मोहन में हेल्पर के तौर पर ही अपनी सेवाएं देना शुरू की। दो साल तक किचन के कामकाज की टं्रेनिग लेने के बाद सन 2010 में विनोद कुमार को एक भारतीय इंटरनेशनल होटल के जरिए मलेशिया जाने का अवसर मिला। विनोद को मलेशिया में ‘तरिओ कैफे’ पंजाबी रेस्टोरेंट में किचन डिपार्टमेंट में बतौर ऑल राउंडर सीनियर किचन चीफ काम करने का अवसर मिला। इस पंजाबी रेस्टोरेंट में लोकल मलेशिया के खाने के साथ पंजाबी खाना पकता था। रेस्टोरेंट में लगातार चार साल तक मलेशिया में काम करने के बाद ही वह अपने घर लौटा था।  इस बीच कंपनी प्रबंधकों ने विनोद को एक बहुत बड़ी जिमेदारी की कमान सौंप दी। 

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कोचीन में पंजाबी रेस्टोरेंट खोलने की जिम्मेदारी 

विनोद को जालंधर और अमृतसर की पच्चीस सदस्यों की टीम के साथ कोचीन में नए पंजाबी रेस्टोरेंट की ओपनिंग करनी थी।  रेस्टोरेंट की ओपनिंग में बड़े व्यवसायी और उनके फैमिली मेंबर बतौर गेस्ट आने तय थे। विनोद के नेतृत्व में इस टीम ने इस चुनौती को स्वीकार करते हुए रेस्टोरेंट के लिए ऐसा मीनू तैयार किया जो भाजन केरल के लोगों को पसंद आ सके। यह विनोद कुमार और उसकी टीम के सदस्यों की मेहनत को फल है कि इस रेस्टोरेंट को जबरदस्त रिस्पॉन्स मिला और कोचीन को नामी रेस्टोरेंट बन गया। 

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कोचीन एक्सप्रेस में छाया कांगड़ा के  हुनर का जलवा 

विनोद कुमार मंगलोत्रा का कहना है कि कोचिंन में पंजाबी रेस्टोरेंट की ओपनिंग कितनी हिट रही थी, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि केरल में सबसे ज्यादा सर्कुलेशन वाली इंग्लिश अखबार ‘कोचीन एक्सप्रेस’ ने विस्तृत स्टोरी लिख कर उनके हाथों के स्वाद की जम कर तारीफ की थी।उनका कहना है कि इमानदारी से किए  गए हर प्रयास में भगवान भी मदद करता है और प्रयास सफल होते हैं।  

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दक्षिण भारत में पजाब का स्वाद 

कंपनी के एमडी के निर्देशन मुताबिक पांच दिनों तक एक हजार लोगों को फ्री  खाना खिलाने के बाद ही रेस्टोरेंट का मीनू बनाने में कामयाब हो पाए। पहली बार केरल के लोगों को अमृतसरी कुलचा बनाकर टेस्ट करवाया तो सभी उंगलियां चाटते रह गए।  ब्रियानी चिकन, बैंगन भरथा, चिकन सूप, चिकन कबाब, तंदूरी चिकन और दाल मखनी रेस्टोरेंट के प्रमुख ब्यंजन थे। विनोद कुमार का कहना है कि किचन सीखा  हुआ  काम किसी भी व्यक्ति को बुढ़ापे तक रोजगार देता है। 

चुवाड़ी से आशीष बहल की रिपोर्ट

रवि भारद्वाज चम्बा के छोटे से गांव से निकल कर आज चीन में सफल योग गुरू है और भारतीय संस्कृति के विस्तार में लगा है। रवि ने  ऐसा कैरियर चुना है कि समाजसेवा के साथ भारत दर्शन का अदभुत संगम चीन के लोगों को करवा रहा है। रवि की यंहा तक पंहुचने का सफर कोई आसान नहीं रहा। सन 1990 में ज्ञान चंद के घर पैदा हुए रवि ने कड़ा संघर्ष किया है। परिवार पिता सरकारी विभाग में ड्राईवर थे और माता गृहणी है। रवि पढ़ाई में एक औसत छात्र था और जमा दो के बाद पढाई से मन बिलकुल हट गया। पैसा कमाने के लिए बद्दी गया, लेकिन एक साल विभिन्न काम करने के बावजूद स्थापित नहीं हो पाया।

बाबा रामदेव के पतंजली योगपीठ हरिद्वार से योग शिक्षा हासिल कर पड़ोसी देश में सफल योग ट्रेनर बनने वाले एक साधारण युवक की आसाधारण सक्सेस स्टोरी 

 
 बाबा रामदेव की पंताजली योगपीठ से योग की शिक्षा
 
रवि के जीवन में बदलाव की कहानी  दिलचस्प है। चुवाड़ी शहर में रवि के ताया सुखदेव भरद्वाज के घर हैं। बद्दी से घर लौटते हुए रवि एक बार चुवाड़ी में रात को रूका। उसके चचेरे भाइयों दलीप भारद्वाज और कुलदीप भारद्वाज ने उसे सलाह दी कि वे पतंजली  विद्यापीठ हरिद्वार में दाखिला लेकर योग में स्नातक डिग्री कर ले।  रवि ने भाईयों  की बातें सुनी और पतंजली येगपीठ से जाने के लिए तैयार हो गया। रवि के भाई दलीप भरद्वाज उसे अपने साथ पतंजली योगपीठ ले गये और वंहा दाखिल करवा दिया।
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  सन 2010 में  रवि में पतंजली योगपीठ में योग की पढ़ाई की और तीन साल योग के गूढ़ रहस्यों और बारीकियों को समझा। सन 2013 में वह बाबा रामदेव का आशीर्वाद लेकर योग की शिक्षा और प्रचार के लिए वंहा से निकल आया। पतंजली से निकलने के बाद रवि पर भारतीय दर्शन की अमिट छाप पड़ चुकी थी ध्येय था तो बस एक योग और संस्कृति को दुनिया तक पंहुचाने का। अब उसने योग और देश की संमृद्य संस्कृति के प्रचार का प्रण ले लिया।
 
 गुडग़ांव- चंडीगढ़ के बाद चीन के लिए उड़ान
रवि ने शुरूआती  दौर में  गुडगांव योगा हेल्थ केयर योगा स्टूडियो में एक साल योग शिक्षा दी और कई योग शिविर लगाए। उसके बाद चंडीगढ़ में एक वर्ष तक योगा अध्यापक के रूप में कार्य किया। सन 2015 में  उसने योग की शिक्षा देने के लिए चीन का रुख किया। चीनी भाषा का ज्ञान न होने के बावजूद रवि ने वहां खुद को योग गुरू के रूप में स्थापित किया। वह चीन में योग के साथ भारतीय दर्शन का भी प्रचारक है

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