धर्म -संस्कृति

नरेंद्र अंगारिया, कुल्लू
सरकारी अधिग्रहण को लेकर सरकार और कुल्लू के राज परिवार के बीच टकराव के चलते ढ़ालपुर में स्थित कुल्लू जनपद के राज देवता रधुनाथ का इन दिनों खूब सुर्खियों में हैं। अधिग्रहण में देरी को लेकर प्रदेश के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह जहां अफसरों को लताड़ रहे हैं, वहीं अधिग्रहण के खिलाफ राज परिवार के वारिस एवं कुल्लू के विधायक महेश्वर सिंह ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। इस मंदिर के अधिग्रहण के मुद्दे पर सियासत भी जम कर हो रही है। मुख्यमंत्री कहते हैं कि रघुनाथ मंदिर किसी की निजी सम्पत्ति नहीं, बल्कि और समूची कुल्लू घाटी के लोग इस मंदिर में पूजा-अर्चना करते हैं। लोगों की इसमें अटूट आस्था है।
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कुल्लू की  जैसी प्राकृर्तिक छटा, वैसी अदभुत मंदिर की कथा 
रघुनाथ मंदिर की जैसी प्राकृर्तिक छटा है, वैसी ही अदभुत इसकी कथा और उससे भी बड़ी इनकी दुख भरी व्यथा है। कुल्लू की खूबसूरत वादियों में बना यह भव्य मंदिर रघुनाथ को समर्पित है।  रघुनाथ मंदिर का आरम्भ ही दु:ख से होता है। इस मंदिर का निर्माण कुल्लु के दिवंगत राजा जगत सिंह ने करवाया था।
राजा को हो गया कुष्ठ रोग, बाबा ने बताया था उपाय
कहते हैं राजा को कुष्ठ रोग हो गया था वैद्यों ने ठीक होने की संभावना से साफ़ इंकार कर दिया। राजा जगत सिंह अपने दुख से दुखी होकर व्याकुल हो रहे थे उसी समय उनकी भेंट भुंतर क्षेत्र में रहने वाले पयहारी बाबा से हुई। पयहारी बाबा ने उन्हें कहा अगर अयोध्या से श्री रघुनाथ जी और सीता माता की वो मूर्ति लेकर यहां आएं, जो अश्वमेघ यज्ञ के समय में श्री राम जी ने स्वयं बनवाए थे।
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मूर्ति स्थापित करते ही दूर हो गया दोष, तो बनवाया मंदिर 
उसके बाद राजा जगत सिंह ने अपने अथक प्रयास से रत्न जडि़त सोने से बनी उस दिव्य मूर्ति को अयोध्या से मंगवाई। यह घटना सन1672 ई की है। रघुनाथ जी और सीता की मूर्ति यहां आते ही राजा का रोग चमत्कारिक रूप से ठीक होने लगा। कुछ ही महीनो में स्वस्थ होकर राजा ने यहां एक भव्य मंदिर का निर्माण करवाया। उसी समय से यहां भगवान श्री रघुनाथ, सीता समेत निवास कर रहे थे। कुल्लू को समर्पित दशहरा उत्सव उसी समय यानी सन 1672 ई से चली आ रही है।
चाटुकार की चाल में फंस गए राजा, गरीब दुर्गादत्त का प्रसंग
कहा जाता है की एक बार राजा जगत सिंह के एक चाटुकार ने दुर्गादत्त नामक एक गरीब ब्राह्मण की झूठी शिकायत राजा से कर दी कि इसके पास चार किलो मणि है। राजा इसका बिना कोई जांच पड़ताल किये ही ब्राह्मण दुर्गा दत्त से जाकर कहा जब तक मैं मणिकर्ण से लौटकर आ रहा हूं तब तक जहां भी छिपाकर मणि रखे हो निकालकर रखना होगा और जब मैं यहां यात्रा से लौटकर आउं तब हमें चार किलो मणि तुम्हें दिखाना होगा।
राजा के आदेश और ब्राह़्मण की मौत के लगा था राजा को श्राप
कहते हैं राजा के बचन से आहत होकर दुर्गा दत्त ब्राह्मण ने अपने पुरे परिवार सहित एक घर में बंद होकर आत्मदाह कर लिया। ऐसी कथा आती है उसी समय से राजा रोगी हो गया ,धीरे धीरे राजा जगतसिंह कुष्ठ रोग से पीडि़त हो गए। बाबा के सुझाव पर आयोध्या से लाकर ढालपुर में रघुनाथ की मूर्ति की स्थापना करने के बाद राजा दोषमुक्त हो गए थे।
रघुनाथ को ही सौंप दिया राज काज, राज बन गए छड़ीबरदार
 कहा जाता है कि राजा को इस बीमारी से मुक्ति तब जाकर मिली जब अयोध्या से पयहारी बाबा के निर्देश पर त्रेतायुगीन सीता और श्री राम की मूर्ति यहां लायी गई।  राजा अपना राजपाठ रघुनाथ को सौंप कर रघुनाथ के छड़ीबरदार बन गए थे। इसी प्रंसग के चलते रघुनाथ को कुल्लू के राज देवता की संज्ञा मिली और जनपद की आस्था रघुनाथ के प्रति गहरी होती गई।
मंदिर से चोरी हुई मूर्ति 45 दिन बाद मिली
रघुनाथ मंदिर से चोरी गई सीता राम की मूर्ति त्रेतायुग की मूर्ति डेढ़ माह बाद बरामद हुई थी।10 दिसंबर, 2014 की रात को रघुनाथ मंदिर में हुई चोरी की वारदात का मुद्दा जहां प्रदेश की विधानसभा में गूंज चुका है, वहीं केंद्र सरकार ने भी मूर्ति बरामदगी को लेकर एजेंसियों को आदेश दिए थे। लोकसभा में शून्यकाल के दौरान मंडी के सांसद रामस्वरूप शर्मा ने यह मामला उठाया था और ऐसी धरोहर मूर्तियों को देश से बाहर जाने पर रोकने की बात की थी।
दशहरा कुल्लू का खास आकर्षण देवता का रथ 
कुल्लू के अंतराष्ट्रीय दशहरा उत्सव का मुख्य आकर्षक रघुनाथ के मंदिर से निकलने वाली रथयात्रा होती है। ढालपुर मैदान पर इस रथयात्रा का हर साल लाखों लोग गवाह बनते हैं। रघुनाथ की रथयात्रा के बहाने कुल्लु दशहरा की  सदियों पुरातन परम्परा को अब नए पंख लग रहे हैं। कुल्लू की नाटी ‘गिनीज बुक ऑफ वल्र्ड रिकॉर्डस’ में शामिल हो चुकी है।

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