ओपिनियन

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जंंगलों में दिनोंदिन कम होती जा रही हरे पेड़ों की तादाद आगामी भविष्य के लिए बहुत बड़ा खतरा है। इस खतरे की शुरुआत हो चुकी है, जिसके चलते जलस्त्रोतों में पेयजल समस्या अभी से शुरू हो चुकी हैं। पानी की गंभीर बनती जा रही समस्या को देखते हुए आईपीएच विभाग ने दो महीनों तक नए कनेक्शन पर भी प्रतिबंध लगा दिया है। हैंडपंप, कुएं, तालाब, खड्ड, डैम, बावड़ी और वाटर सप्लाई भी पानी की कमी से प्रभावित हो रहे हैं। जलस्त्रोतों की संख्या बढ़ी हैं तो पानी की समस्याएं भी बढ़ती ही जा रही हैं। हालांकि सरकारें पर्यावरण संरक्षण के लिए गंभीर प्रयास कर रही हैं, मगर ये प्रयास कहां तक सफल हो पा रहे हैं, यह किसी से छुपा नहीं है। सरकार के साथ-साथ दूसरे सामाजिक संगठन भी हर साल पौधारोपण करके मीडिया के जरिए वाहवाही लूटते हैं, मगर सच्चाई यह है कि पौधारोपण के बाद बहुत कम लोग ही ऐसे पौधों की देखभाल करना मुनासिब समझते हैं। पौधारोपण की सामूहिक फोटो खिंचवा कर सोशल मीडिया में डाले जाने का ट्रेंड सा चल पड़ा है। नेतागण भी पौधारोपण के बहाने लाखों रुपए का बजट खर्च कर देते हैं, लेकिन दोबारा कोई नन्हे पौधों की तरफ मुड़कर देखना मुनासिब नहीं समझता। अगर समय रहते पेड़ों की सुरक्षा नहीं की गई तो आने वाले समय में आम जनमानस को एक-एक बूंद पानी के लिए भी हाथ-पैर मारने के लिए अभी से कमर कस लेनी होगी।  
एक समय था जब खड्ड और नालों में अकसर पानी बहता रहता था। इस तरह चौबीस घंटे पानी बहते रहने का मतलब साफ  था कि जमीन के अंदर बेतहाशा पानी था, मगर अब खड्ड और नालों के पानी में भारी कमी आई है। कहीं-कहीं मवेशियों को भी पानी अब नसीब नहीं होता है। पेड़ों की कमी का असर अब समय पर बारिश न होना भी है। दस साल के बाद जंगल का इलाका पेड़ कटाई के लिए सरकार खोलती है। इस दौरान विभाग और कुछेक ठेकेदारों की आपसी मिलीभगत में उम्रदराज पेड़ों के साथ-साथ छोटे पेड़ भी बलि चढ़ा दिए जाते हैं। किसान भी अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए कई बार छोटे पेड़ों को बेचकर घर का खर्चा चलाता है। सच कहा जाए तो पेड़ों की संख्या कम होती जा रही है और आगे पौधरोपण सिर्फ औपचारिकता के तौर पर कर रहे हैं। यही वजह है की पेड़ों की तादाद दिनोंदिन कम होती जा रही है। पहाड़ी राज्य  हिमाचल पर्यावरण की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है। पिछले कुछ सालों से जंगलों में कुल्हाड़ी इस कदर चल रही है कि अब पेड़ों की बजाय खरपतवार पौधे ही जंगलों में शेष बचे दिखाई देते हैं। ऐसे में स्वच्छ पर्यावरण की कामना कैसे की जा सकती है? वर्ष 2008 में पेड़ों के कटान पर प्रतिबंध लगाया गया था। इसके बाद हालात ऐसे बन गए थे कि लोगों को मृतक इंसान का दाह-संस्कार के लिए भी पर्याप्त लकड़ी नहीं मिल पा रही थी। जनता की मांग पर एक बार फिर से पेड़ों का कटान शुरू हुआ और यह सिलसिला अभी तक जारी है।
अब सवाल उठता है कि जंगलों की सुरक्षा किस तरह की जाए। गर्मियों का मौसम शुरू हो चुका है और हर साल जंगलों के पेड़ धू-धू कर जल जाते हैं। जंगलों में अचानक आग लगना वन विभाग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े करता है। आखिर क्यों विभाग पेड़ों को जलने से बचाने के लिए सफल नहीं हो पाता है। वन रक्षक ही अगर बिना वर्दी और हथियारों के साथ ड्यूटी करेंगे तो जंगलों की बजाय अपनी सुरक्षा ही कर पाना एक बड़ी चुनौती है। विभाग को चाहिए कि जनता का सहयोग लेकर जंगलों के साथ लगते गांवों के लोगों को आग पर काबू पाने के गुर सिखाए। वास्तब में अगर इस तरह की कोई पहल की जाती है तो सफलता हासिल की जा सकती है। 
दूसरी तरफ  खड्डों में अवैध खनन का दौर रुकने का नाम नहीं ले रहा है। जेसीबी मशीनों से खड्डों में कई-कई फुट गहरे गड्ढे  कर प्रकृति से खिलवाड़ किया जा रहा है। जब-जब भी खिलवाड़ हुआ है, इसके गंभीर परिणाम इनसान को ही भुगतने पड़े हैं। अवैध खनन की मार से भी जल स्त्रोत प्रभावित हुए हैं। सरकार को चाहिए कि पेड़ों के अवैध कटान पर प्रतिबंध और खड्डों में हो रहे अवैध खनन पर लगाम कसनी चाहिए, ताकि भविष्य में आने वाली समस्याओं से बचा जा सके। 
 सुखदेव सिंह

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हिमाचल प्रदेश की सियासत उफान पर है। प्रदेश में सत्तासीन कांग्रेस के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह जहां एक ओर कानूनी पचड़ों में उलझे हैं तो दूसरी ओर पार्टी संगठन के काम-काज को लेकर वे खुश नहीं बताए जा रहे हैं। उधर, दूसरी ओर भोरंज उपचुनाव में मिली जीत के बाद प्रदेश भाजपा पूरी तरह से इलेक्शन मोड में आ चुकी है। पहाड़ को जीतने के लिए भाजपा दिल्ली में रणनीति बना चुकी है। अब 27 अप्रैल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शिमला रैली के जरिये भाजपा अपने मिशन 50 प्लस की रफ्तार को तेज करने की पुरजोर कोशिश में है। हालांकि प्रदेश में चुनाव छह महीने बाद होने हैं, लेकिन खबरें इस तरह की भी हैं कि चुनाव से पहले भाजपा जोड़-तोड़ की राजनीति के सहारे कांग्रेस  सरकार को प्रदेश की सत्ता से दूर करने की रणनीति पर काम कर रही है। इसी रणनीति के तहत भाजपा न केवल निर्दलीय विधायकों पर डोरे डाल रही है, बल्कि   दावे तो यहां तक किए जा रहे हैं कि कांग्रेस के कुछ मंत्री, संसदीय सचिव और विधायक तक भाजपा नेताओं के संपर्क में हैं। कहा जा रहा है कि मोदी के शिमला दौरे के दौरान भाजपा बड़े राजनीतिक घटनाक्रम  की तैयारी में है। इधर, कांग्रेस का सारा दारोमदार वीरभद्र  सिंह पर है। यही कारण है कि कांग्रेस आलाकमान से उन्हें चुनाव के लिए फ्री हैंड देने की मांग होने लगी है। तर्क दिया जा रहा है कि पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान वीरभद्र सिंह ने जिस अंदाज में भाजपा के मिशन रिपीट की हवा निकाली थी, इस बार भी वे वैसा करिश्मा दिखाने का दम रखते हैं। दोनों दलों की ओर से पहाड़ जीतने के लिए मैदान से तैयारी पूरी है।    

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स्मार्ट सिटी धर्मशाला के चयन को लेकर मामला प्रदेश  के उच्च न्यायालय तक पहुंचा था। स्थानीय विधायक एवं शहरी आवास मंत्री सुधीर शर्मा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘स्मार्ट सिटी मिशनÓ में धर्मशाला को शामिल करवाने के लिए तथ्यपरक गहन शोध एवं अध्ययन किया था। उन्होंने इन नेशनल मिशन में अपने विधानसभा क्षेत्र के  ऐतिहासिक धर्मशाला शहर की दावेदारी के लिए अदालत में गंभीर पैरवी की और नतीजतन धौलाधार के आंचल तले बसे शहर का नाम देश के उन सौ शहरों की सूचि में शामिल हो गया, जिन्हें केंद्र सरकार की उदार सहायता से देश के स्मार्ट शहरों में शामिल करना है। यह किसी सपनों के शहर को हकीकत में जमीन पर उतार लाने की महात्वाकांक्षी परियोजना है, जिसके लिए केंद्र दिल खोल कर  पैसा दे रहा है। परियोजना का क्रियान्यवयन सबसे बड़ी चुनौती  है। स्मार्ट सिटी का जिस तरह से  कागजी ड्राफ्ट तैयार किया गया है, हकीकत में सब कुछ वैसा हुआ तो तिब्बती धर्मगुरू दलाई लामा और अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम की मौजूदगी के चलते दुनिया भर में मशहूर इस शहर का रूतबा और बड़ा हो जाएगा। स्थानीय विधायक जिस तरह से इस प्रोजेक्ट को अपना ड्रीम प्रोजेक्ट बताकर जितनी गंभीरता से काम कर रहे हैं, इस बात में कोई दो राय नहीं है कि अगले विधानसभा चुनाव से पहले स्मार्ट सिटी हकीकत की जमीन पर नजर आने शुरू हो जाएगी। इसके लिए तमाम जरूरी मैकेनिज्म जुटाया जा चुका है, विशेषज्ञों ने काम करना शुरू कर दिया। स्थानीय विधायक को इतना जरूर याद रखना होगा कि स्मार्ट सिटी की दावेदारी के लिए उन्हें अदालत को दरवाजा देखना पड़ा था, ऐसे में उनके  हर काम पर राजनीतिक विरोधियों की नजर रहेगी।

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