मनी मैटर्स

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हर साल प्रदेश को हो सकती है करोड़ों रूपयों की बचत, सोलर काम्युनिटी कुकिंग के लिए प्रदेश मंदिर ट्रस्टों को करनी होगी पहल

दिल्ली से अशीष नड्डा की रिपोर्ट 

सोलर यानी सूर्य से प्राप्त ताप ऊर्जा से जब खाना पकाने की बात आती है तो हम सबके मन में उस सोलर कुकर की याद आ जाती है, जो कहीं न कहीं हमने स्कूल आदि में देखा होता है।  सोलर एनर्जी में दुनिया भर के रिसर्च के बावजूद भी सोलर कुकर घरेलू प्रयोग के लिए  वायेबल नहीं हो पाया। इसके टेक्नोलॉजिकल से लेकर समाजिक कारण भी हैं। टेक्नोलॉजी की बात करें तो बॉक्स जैसे दिखने वाला यह कुकर खाना बनाने में बहुत समय लेता है और सिर्फ उबला हुआ खाना ही बना पाता है। चटपटे स्वाद के चटखारे लेने वाले हम भारतीयों को भला फिर यह कहां भाता। सामजिक कारण यह है कि सूर्य की किरणे खुले में यानी छत और आंगन में हि होंगी और खाना पकाना बनाना यह सब परदे के पीछे किया जाने वाला कार्य कहा जाता है इसे आंगन में सबको दिखाते हुए कोई नहीं करना चाहेगा।   nit-hamirpur-men-laga-community-coocking

 परन्तु सोलर कुकिंग का कांसेप्ट घेरलू प्रयोग पर ही खत्म नहीं हो जाता । एक सेक्टर ऐसा है जहां सोलर कुकिंग आज के दौर में बहुत किफायती सिद्ध हो रहा है। उसे नाम दिया गया है सोलर कम्युनिटी कुकिंग। कम्युनिटी कुकिंग बोले तो बहुत से लोगों के लिए भोजन जहां बनता हो, जैसे हमारे मंदिरों गुरुद्वारों के लंगर भवन, शैक्षणिक संस्थानों के होस्टल्स आदि। 

कम्युनिटी कुकिंग कांस्पेट 

सोलर कम्युनिटी कुकिंग का कांसेप्ट बहुत सिंपल है और इसके  प्रयोग होने वाला कुकर भी डब्बे जैसा नहीं दिखता है। हम सब ने बचपन में एक शरारत तो की है। जब हम लोग चुपके से मिरर यानी मुंह देखने वाला आईना लेकर उसे सूरज की तरफ सेट करके उसके फोकस यानी चमकारे को अपने पडोसी के मुंह पर केंद्रित कर देते थे और उसे समझ नहीं आता था यह चमक कहां से पड़ रही है। और हम छुपकर उसकी दुविधा का आनंद लेते थे। अगर एक काम क्या जाए। घर में

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एल्युमीनियम आदि धातु के किसी गोल टुकड़े को ब्लैक पेंट से रंग  दिया जाए और एक  दिवार से टांग दिया जाए।  फिर गांव से 10 शरारती बच्चे मिलकर 10 शीशे ( मीरर) हाथ में पकड़ लें और उनके फॉक्स को एक जगह उस ब्लैक पेण्टिएड एल्युमीनियम पर केंद्रित कर दें तो क्या होगा? सूर्य की किरणे शीशे पर पड़ती हुयी वहां से रिफ्लेक्ट होकर सीधे एल्युमीनियम प्लेट  की तरफ जा रहीं होंगी और 10 शीशों से एक साथ यह किया जा रहा होगा तो जाहिर है एल्युमीनियम की वो ब्लैक प्लेट गर्म हो जाएगी।इतनी गर्म कि आप हाथ भी नहीं लगा पाएंगे।  अब अगर 10 और बच्चे अपना अपना शीशा लेकर इस खेल में शामिल हो जाएं तो क्या होगा ?  वो प्लेट इतनी ज्यादा गर्म हो जाएगी की उसके ऊपर प्लस्टिक रख दिया जाये वो भी पिघल जाएगा। अब उस प्लेट की जगह हम एल्युमीनियम का ब्लैक छोटा सा पतीला पानी से भर के रख दें तो जाहिर है पहले पतीला गर्म होगा फिर अंदर पानी भी गर्म होना शुरू होगा। एक घंटे तक ऐसा किया जाए तो पानी नहाने लायक हो जाएगा। यानी बिना लकड़ी जलाये, बिना एलपीजी प्रयोग किया बिना केरोसीन प्रयोग किये बिना इलेक्ट्रिक रॉड और गीजर के नहाने का पानी सिर्फ भगवान सूर्य नारायण की किरणों से गर्म। बस यही कांसेप्ट है सोलर कम्युनिटी कुकिंग का। 

ऑस्ट्रिया की रिसर्च

सोलर कम्युनिटी कुकिंग का इसके लिए  शीशों वाला ऐसा  उपकरण तैयार किया  आस्ट्रिया के एक रेसेर्चेर Wolfgang Scheffler  ने और उन्ही के नाम पर  इस उपकरण (सोलर कॉन्सेन्ट्रेटर) को नाम दिया गया Scheffler Dish .इस  dish टाइप स्ट्रक्चर मे शीशे लगे होते हैं और उन सबका फोकस एक जगह ही सेट किया गया होता है। हमारी धरती अपनी धुरी पर 24 घण्टे में चक्र पूरा करती है ट्रिग्नोमैट्री की भाषा में बात की जाए तो 360 डिग्री अपने अक्स पर घूमने के लिए धरती 24 घण्टे लेती है यानी हर एक घंटे में 15 डिग्री। इस कारण आसमान पर जो सूरज हम 9 बजे देखते हैं वो हमें 10 बजे अगले स्थान पर दिखता प्रतीत होता है। यानी वो 15 डिग्री अपनी पोजीसन चेंज कर चुका होता है। अब जब सूरज की पजिसन बदली तो पतीले पर किरणों का फोकस बना रहे। इसके लिए हमने शीशे वाले स्ट्रुक्टर यानी शेफलर डिश को भी 15 डिग्री सूरज की नई पाजेसन की और सेट करना होगा। यह काम इलेक्ट्रिक मोटर और गियर ड्राइव से हो जाता है। यानी सूरज जहां भी हो शेफलर डिश उसकी तरफ सूरजमुखी के फूल की तरह पोजीसन लेकर रखती है और फोकस हमेशा एक जगह सेट होता है।

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 सोलर कम्युनिटी कुकिंग

 सोलर कम्युनिटी कुकिंग दो तरीकों से हो सकती है या तो पतीले को ह्यष्द्धद्गद्घद्घद्यद्गह्म् स्रद्बह्यद्ध  के सामने रख दो।  या द्बठ्ठस्रद्बह्म्द्गष्ह्ल कुकिंग जो ज्यादा प्रचलन में हैं।  इंदिरेक्ट कुकिंग ज्यादा  मात्रा में की जा सकती हैऔर किचन के अंदर की जा सकती है। जबकि इनडाइरेक्ट कुकिंग के लिए बर्तनों को भी बाहर ले जाना पड़ता है। इस सारी स्टीम को पाइप से किचन में पहुंचाया जाता है जहां लंगर या हॉस्टल के लिए भारी भारी मात्रा में खाना बनता है। वहां अलग तरह के बर्तन प्रयोग में लाये जाते हैं, जिनमे दो साइड्स होती हैं यानी होलो टाइप।  जैसे बड़ी बाल्टी के अंदर छोटी बाल्टी रख दी जाए अब अंदर वाले पार्ट में चावल  और पानी डाल  दो उसे ढक  दो और बाहर वाले में शेफलर डिश सिस्टम से आने वाली स्टीम लाइन का कनेक्शन दे दो।  वाल्व को खोलने पर स्टीम बाहर वाले स्पेस में जमा हो जाएगी और अपनी सारी ताप हीट ऊर्जा  चावलों  पानी से भरे  बर्तन को दे देगी। चन्द मिनटों में  20  किलो से लेकर 50 किलो चावल उबाल जाएंगे और ऊर्जा देने के बाद स्टीम पानी में तब्दील हो जाएगी वो पानी भी गर्म होगा उसे बाकायदा बर्तन धोने के काम लाया जा सकता है। 

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उबालने का तेज काम 

बिना एलपीजी लकड़ी के चावल तैयार ऐसे ही इन स्पेशल बर्तनों में दाल को उबाला जा  सकता है, तड़का बेशक गैस पर लगा लिया जाए पर जहां सैंकड़ों की तादाद में लोगों के लिए खाना बन रहा हो वहां क्विंटल के हिसाब से दालें प्रयोग होती हों। जरा सोचिये, वहां कितनी गैस उनको उबालने के लिए बचेगी। आलू आदि भी इसी तरीके से उबाले जा सकते हैं। लंगरों का मुख्य भोजन दाल चावाल ही रहता है।  स्टीम को चवाल, दाल, आलू उबालने  के लिए डायरेक्ट प्रयोग भी किया जा सकता है, पर इसके लिए यह सुनिशित करना जरूरी है कि जिन पाइप्स से स्टीम आ रही है वो पाइप्स एक दम साफ हों उनमे जंग आदि न लगा हो। उसके लिए बर्तन के नीचे स्टीम आने के लिए  होल्स बने होते हैं। गुडग़ांव के पास एक सिस्टम मैंने विजिट किया था जहां 10 -15 मिनट में 20 किलो चावल इस विधि  द्वारा उबालकर तैयार कर लिए जाते हैं। 

धार्मिक संस्थानों में प्रयोग

ऐसा नहीं है की यह कांसेप्ट प्रयोग में नहीं लाया जा रहा है। बहुत से धार्मिक संस्थान जैसे माउंट आबू में ब्रह्मकुमारी आश्रम, शिरडी साईं मंदिर महाराष्ट्र, आदि इसे प्रयोग कर रहे हैं और लंगर भवनों में गैस के रूप में लाखों की बचत कर रहे हैं।  हिमाचल प्रदेश में भी  बाडू जिला सिरमौर स्थित अकाल यूनिवर्सिटी की छत पर डायरेक्ट कुकिंग वाले सिसटम 2011 में मैंने विजिट किये थे।  आर्मी कैंप लेह में भी इस तरह से कुकिंग की जा रही है। मेरे खुद के एक्स संस्थान एआईटी हमीरपुर में भी पिछले पांच साल से विंध्याचल हॉस्टल में  एनर्जी सेण्टर के तात्कालिक विभाग अध्यक्ष प्रोफेसर चंदेल के प्रयासों से ऐसा ही स्टीम कुंकिंग सिस्टम प्रयोग हो रहा है।   

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बचत का गणित 

इकनोमिक लेवल पर अगर सोलर स्टीम कुकिंग की बात करें तो सबसे संजीदा  उदहारण एनआईटी हमीरपुर से ही लेकर चलते हैं। जहां 500 बच्चों के हॉस्टल के लिए ऐसा ही सिस्टम लगा है और हर दिन वहां 2 कमर्शियल एलपीजी  सिलेंडर  की बचत है।  एक एलपीजी सिलेंडर (कमर्शियल) का रेट आज मार्किट में लगभग 850 रूपए के करीब है  यानी 1700 रूपए की बचत सोलर सिस्टम से हो रही है दो महीने बरसात के काट लिए जाएं तो 300 दिन भी सोलर कुंकिंग सिस्टम काम करता है तो लगभग 5 लाख की बचत एक वर्ष में हो रही है। यह सिस्टम 2012 में वहां 18 लाख  में लगा था जिसमे से 30 प्रतिशत भी सरकार ने सब्सिडी के रूप में दिए होंगे तो यह सिर्फ 12 लाख साठ हजार में पड़ा होगा। यानी दो से ढाई साल में पैसा पूरा।  ऐसे सिस्टम लगाने के लिए मंदिर ट्रस्ट और संस्थान आगे आते हैं तो भारत सरकार की तरफ से 30 प्रतिशत कैपिटल सब्सिडी और इनकम टेक्स बेनिफिट अलग से मिलते हैं। जरा सोचिये जहां हजारों लोगों का खाना  मंदिरों में बन रहा है वहां तो करोड़ो की बचत एक वर्ष में हो जाएगी।  स्टीम को इंसुलेटेड टैंक में स्टोर करके रात के लिए भी प्रयोग में लाया जा सकता है।  

 

शूलिनी यूनिवर्सिटी मॉडल

शूलिनी यूनिवर्सिटी सोलन में भी कुकिंग सिस्टम लगा है जहां किसी अंकित नाम के छात्र ने उसमे कुछ सुधार किया था, इसलिए अब 500 की जगह 700 छात्रों का खाना बनने लगा है। परंतु अभी तक मंदिरों ट्रस्टों  ने इस तरफ ज्यादा रुझान नहीं दिखाया है। हिमाचल प्रदेश में ज्वालाजी चिंतपूर्णी , नैना देवी, चामुंडा देवी ब्रजेश्वरी देवी आदि शक्तिपीठ हैं, साथ ही बाबा बालक नाथ , बाबा बड़भाग सिंह रुद्रु बाबा आदि अन्य स्थान हैं, जहां लंगर चले रहते हैं। शैक्षिणिक संस्थानों के हॉस्टल हैं जहां इस विधि से लाखों रूपए के साथ साथ ऊर्जा के एलपीजी टाइप अन्य विकल्पों की बचत आने वाली पीढिय़ों के लिए की जा सकती है। हो सकता है मंदिरों के पास बहुत पैसा हो उन्हें एलपीजी का खर्चा मायने न रखता हो फिर भी बात सिर्फ पैसों की नहीं है, बल्कि ऊर्जा के इन स्त्रोतो  को आने वाली पीढिय़ों के लिए बचाकर रखने की भी जरुरत है। पालिसी प्लानिंग की टर्म में इसे  'इंट्रा जनरेशनल इक्विटीÓ  का नाम दिया गया है। यानी सारे संसाधन सिर्फ हमारी पीढ़ी के लिए नहीं हैं। हिमाचल प्रदेश में भी मंदिरों  शिक्षण  संस्थानों को  भी यह सिस्टम लगाने के लिए आगे आना चाहिए। सरकार को चाहिए की जो मंदिर उसके अधिग्रहण में हैं वहां से शुरुआत की जाए और सलाना होने वाली करोड़ों की बचत को  विकास कार्यों में खर्च किया जाए।  

लेखक आईआईटी दिल्ली में रिसर्च स्कॉलर हैं और सोलर ऐंड क्लीन एनर्जी की फील्ड में काम करनेवाली कंपनी “Sunkrit Energy Pvt. Ltd” के डायरेक्टर भी हैं। 

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