आने वाले दिनों में जहां हिमाचल प्रदेश के पशुपालकों को हरे चारे की समस्या से निजात मिल जाएगी, वहीं प्रदेश में दूध उत्पादन भी पहले के  मुकाबले बढ़ जाएगा। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मंडी के विशेषज्ञों ने वंडर प्लांट कहे जाने वाले अजोला को  प्रदेश के विभिन्न जलवायु वाले क्षेत्रों में   उगाने में आरंभिक कामयाबी हासिल कर ली है। आरंभिक चमत्कारिक परिणामों के बाद आईआईटी मंडी की टीम अजोला से होने वाले लाभों का आकलन करने में जुटी हुई है।

वंडर प्लांट : आईआईटी मंडी की टीम को सदाबहार चारा 'अजोला हिमाचल की जलवायु में उगाने के मिली बड़ी कामयाबी


मंडी से विनोद भावुक की रिपोर्ट

 

सिर्फ चार महीने ही पशुओं को नसीब होता हरा चारा


हिमाचल प्रदेश में हरे चारे की समस्या विकराल हो चुकी है। घासनियों पर कांग्रेस ग्रास का कब्जा हो चुका हैं।  ऐसे में  पशुओं  को सुबह- शाम धान
का पुआल अथवा तूड़ी जैसे अपौष्टिक सुखे चारे के सहारे ही छोडऩा पड़ता है। दुधारू पशुओं को प्रतिदिन कम से कम दो किलो दाने की आवश्यकता होती है।
चारा दाना मंहगा होने के  कारण पशुओं  को पर्याप्त मात्रा में नहीं मिल पाता है। इसके चलते पशुओं में तेजी से कुपोषाण बढ़ता है।

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अब अपने घर के आंनग में उगाईए साल भर हरा चारा


पशुआहार के विकल्प की खोज में विस्मयकारी फर्न-अजोला सदाबहार चारे के रूप में उपयोगी हो सकता है। कम लागत पर पैदा होने वाले इस चारे  से
पशुपालन व्यवसाय को लाभकारी बनाया जा सकता है।  चारे की लागत कम होगी तो पशुपालन घाटे का सौदा नहीं रहेगा। पशुपालन के घाटे को पाटने के लिए
प्रकृति प्रदत्त अजोला की भूमिका अहम हो सकती है। ऐसे में जबकि वनों एवं पारंपरिक चारागाहों  का क्षेत्रफल घटता चला जा रहा है। अजोला चमत्कारी
साबित हो सकता है। दुग्ध उत्पादन लागत में कमी कर अजोला जैसा सस्ता चारा पशुपालको  के लिए वरदान बन सकता है। इस चारे को घर-आंगन में उगा सकते हैं और साल भर हरा चारे का उत्पादन कर सकते हैं। अजोला के बेहतर नतीजे सामने आ रहे हैं।

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हरी खाद के रूप में भी बड़ा क्रांतिकारी नाम है अजोला


अजोला  तेजी से बढऩे वाली एक प्रकार की जलीय फर्न है, जो  पानी की सतह पर तैरती रहती है। धान की फसल में नील हरित काई की तरह अजोला को भी हरी खाद के रूप में उगाया जाता है और कई बार यह खेत में प्राकृतिक रूप से भी उग जाता है। इस हरी खाद से भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ती है और उत्पादन में भी
आशातीत बढ़ोतरी होती है। अदभुद पौधे अजोला में उच्च मात्रा में प्रोटीन उपलब्ध होता है। प्राकृतिक रूप से यह उष्ण व गर्म उष्ण कटिबंधीयक्षेत्रों में पाया जाता है। देखने में यह शैवाल से मिलती जुलती है और आमतौर पर उथले पानी में अथवा धान के  खेत में पाई जाती है।

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सस्ता सा दिखने वाले इस अजोला के हैं बडे-बड़े गुण

 

अजोला सस्ता, सुपाच्य एवं पौष्टिक पूरक पशु आहार है। इसे खिलाने से वसा व वसा रहित पदार्थ सामान्य आहार खाने वाले पशुओं के दूध में अधिक पाई जाती
है। अजोला  पशुओं में बांझपन निवारण में उपयोगी है। पशुओं के पेशाब में खून की समस्या फॉस्फोरस की कमी से होती है। पशुओं को अजोला खिलाने से यह
कमी दूर हो जाती है। अजोला में प्रोटीन आवश्यक अमीनो एसिड, विटामिन (विटामिन ए, विटामिन बी-12 तथा बीटा-कैरोटीन) एवं खनिज लवण जैसे
कैल्शियम, फास्फोरस, पोटेशियम, आयरन, कापर, मैगनेशियम आदि प्रचुर मात्रा में पाए जाते है। इसमें वसा की मात्रा अत्यंत कम होती है।

 

और गाढ़ा हो जाएगा दूध, बढ़ जाएगी दूध की पैदावार


दुधारू पशुओं पर किए गए प्रयोगों से साबित होता है कि जब पशुओं को  उनके दैनिक आहार के   साथ 1.5 से 2 किग्रा अजोला प्रतिदिन दिया जाता है तो
दुग्ध उत्पादन में 15-20 प्रतिशत वृद्धि  दर्ज की गई है। इसके  साथ इसे खाने वाली गाय-भैसों की दूध की गुणवत्ता भी पहले से बेहतर हो  जाती है।प्रदेश में मुर्गीपालन व्यवसाय भी बहुतायत में प्रचलित है। यह बेहद सुपाच्य होता है और  यह मुर्गियों का भी पसंदीदा आहार है। पोस्ट्री फार्ममें आहार के  रूप में अजोला का प्रयोग करने पर ब्रायलर मुर्गो के भार में वृद्धि तथा अंडा उत्पादन में भी वृद्धि पाई जाती है।आरंभिक नजीते रहे शानदार, कई जगह  प्रयोग रहा सफल आईआईटी मंडी की ओर से वंडर प्लांट अजोला लगाने के आरंभिक नजीते शानदार रहे हैं। आईआईटी की विशेषज्ञों की ओर से इस प्लांट की सक्सेस रेट का पता लगाने के लिए मंडी के विभिन्न जलवायु वाले क्षेत्रों जैसे बल्ह घाटी, सनौर घाटी, चौहार घाटी सहित कई जगहों पर अजोला पैदा करने के प्रयोग
शानदार रहे हैं। मंडी आईआई के आरंभिक प्रयोगों में सामने आया है कि अन्यदुधारू पशु तो बड़े चाव से अजोला को खा रहे हैं, लेकिन पहाड़ी गाय इसको
खाने से कुछ आनाकानी कर रही है। इस बारे में भी प्रयोग जारी हैं।

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अजोला एक फायदे अनेक


अजोला से दूध की मात्रा और गुणवत्ता बढ़ती है। अजोला सूअर, खरगोश,मुर्गी, बत्तख और मछली सहित पशुओं के विभिन्न प्रकार के लिए भोजन के पूरक
के रूप में प्रयोग किया जाता है। इतना ही नहीं चमत्कारी पैदा अजोला बायोगैस के उत्पादन में इस्तेमाल किया जा सकता है। अजोला खरपतवार के
नियंत्रण के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। अजोला एक जैव उर्वरक के रूप मे चावल, गेहूं सहित अन्य फसलों के लिए लाभप्रद है। इतना ही नहीं केंचुआ
खाद बनाने के लिए भी अजोला का प्रयोग बेहद लाभकारी साबित हुआ है। इस प्लांट कीर सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसे सिर्फ एक बार ही उगाना है, फिर
यह पौध अपने आप साल भर हरे चारे के रूप में आपके आंगन में ही उगा रहेगा।

 

गुणों से भरपूर है यह चारा


अजोला प्रोटीन, आवश्यक अमीनो एसिड, विटामिन (विटामिन ए, विटामिन बी 12 और बीटा कैरोटीन), खनिज कैल्शियम फास्फोरस, पोटेशियम, लौह, तांबा,
मैग्नीशियम से भरपूर है तथा पशुओं के विकास मे भी सहायक है। सूखे वजन के  आधार पर इस मे 25-30 प्रतिशत प्रोटीन,10-15 प्रतिशत मिनरल्स और 7-10
अमीनो एसिड, जैव सक्रिय पदार्थ और जैव पॉलिमर पाये जाते हैं। इसकी उच्च  प्रोटीन और कम लिग्निन सामग्री के कारण पशुधन आसानी से इसे पचा सकते हैं।
अजोला पशुओं के चारे के साथ मिलाया जा सकता है या  सीधे दिया जा सकता है।दुधारू पशुओं के लिए यह सबसे कम लागतवाला हरा चारा साल भर आपके डेयरी फार्म के पास ही उपलब्ध रहेगा। पशु तंदरूस्त रहेेंगे, दूध उत्पादन की लागत कम होगी और दूध की पैदावार ज्यादा होगी। पशुपालन लाभदायक हो जाएगा।

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बड़ा ही आसान है अजोला को उगाना

 

 अजोला की तेज पैदावार और उत्पादन के लिए इसे प्रतिदिन उपयोग हेतु लगभग 200 ग्राम प्रति वर्गमीटर की दर से बाहर निकाला जाना आवश्यक हैं।  अजोला
तैयार करने के लिए अधिकतम 30 डिग्री सेंग्रे तापमान उपयुक्त माना जाता है। समय-समय पर गड्ढे में गोबर एवं सिंगल सुपर फॉस्फेट डालते रहें, जिससे
अजोला फर्न तीव्रगति से विकसित  होता रहे। प्रति माह एक बार अजोला तैयार करने वाले गड्ढे या टंकी की लगभग 5 किलो मिट्टी को ताजा मिट्टी से
बदलेें, जिससे नत्रजन की अधिकता या अन्य खनिजों की कमी होने से बचाया जा सके। एजोला तैयार करने की टंकी के पानी के पीएच मान का समय-समय पर
परीक्षण करते रहें। इसका पीएच मान 5.5-7.0 के  मध्य होना उत्तम रहता है।10 दिनों के अन्तराल में, एक बार अजोला तैयार करने की टंकी या गड्ढे से

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25-30 प्रतिशत पानी ताजे पानी से बदल देना चाहिए, जिससे नाइट्रोजन की अधिकता से बचाया जा सके  हर 6 माह के अंतराल में, एक बार अजोला तैयार
करने की टंकी या गड्ढे को पूरी तरह खाली कर साफ कर नये सिरे से मिट्टी,गोबर, पानी एवं अजोला कल्चर डालना चाहिए। अजोला की उत्पादन लागत
बहुत ही कम आती है, इसलिए यह किसानों के  बीच तेजी से लोकप्रिय होता जा रहा है। दक्षिण भारत से शुरू हुआ अजोला की खेती का कारवां अब इस पहाड़ी
प्रदेश तक आ पहुंचा है। आईआईटी मंडी की ओर से प्रगतिशील पशुपालकों को अजोला कल्चर सहित अलोचा तैयार करने की किट बांटी गई है।

 

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